Life and Journey of Superstar

शब्दों की माला के अदभुद जादूगर- कैफ़ी आजमी
Abbas29 - Copy.jpg                                      वक्त ने किया क्या हसीं सितम... ये ज़मना रहे ना रहे ...यह गीत अब अमर है....इस गीत को लिखा था मशहूर कवि और गीतकार कैफ़ी आज़मी साहब ने, हिंदी और उर्दू भाषाओँ मे शानदार पकड़ के महारथी कैफ़ी का जन्म उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ जिले के छोटे से गाँव मिजवान में सन 1915 में हुआ. कैफ़ी आज़मी के तहसीलदार पिता उन्हें आधुनिक शिक्षा देना चाहते थे. किंतु रिश्तेदारों के दबाव के कारण कैफ़ी आज़मी को इस्लाम धर्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिए लखनऊ के 'सुलतान- उल- मदरिया' में भर्ती कराना पड़ा. लेकिन वे अधिक समय तक वहाँ नहीं रह सके. उन्होंने वहाँ यूनियन बनाई और लंबी हड़ताल करा दी. हड़ताल समाप्त होते ही कैफ़ी आज़मी को वहाँ से निकाल दिया गया. बाद में उन्होंने लखनऊ और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शिक्षा पाई और उर्दू, अरबी और फ़ारसी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया. नर्म नाजुक शब्दों से सजे न जाने कितने ऐसे गीत हैं जिनसे कैफी आजमी की सौंधी महक आती है. गाँव के भोलेभाले माहौल में कविताएँ पढ़ने का शौक लगा तो घर के लोगो ने लिखने की प्रेरणा दी और यही से जन्म हुआ महान कैफ़ी आज़मी का जिन्होने जो लिखा उम्दा लिखा और वो कभी भी अपनी लेखन शैली मे वक़्त की ज़रूरत के बजाय विषय को तवज्जो दी.



किशोर होते- होते कैफ़ी मुशायरे में शामिल होने लगे और लोगो की वाह वाही लूटने लगे. वर्ष 1936 में साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित हुए और सदस्यता ग्रहण कर ली इसी का परिणाम था की उन्होने नाट्य परंपरा की शुरुआत हुई जो आम लोगों को अपनी कला और विरासत दिखाने का ज़रिया बन गया.



धार्मिक रूढि़वादिता से परेशान कैफी को इस विचारधारा में जैसे सारी समस्याओं का हल मिल गया. उन्होंने निश्चय किया कि सामाजिक संदेश के लिए ही लेखनी का उपयोग करेंगे. 1943 में साम्यवादी दल ने मुंबई कार्यालय शुरू किया और ‍उन्हें जिम्मेदारी देकर भेजा. यहाँ आकर कैफी ने उर्दू जर्नल ‘मजदूर मोहल्ला’ का संपादन किया. यह वो अहम मोड़ था जब मुंबई आ कर फिल्मी दुनिया को जल्द ही यह बताने वाले थे की अब जल्द ही उनके बीच एक महान गीतकार आने वाला है जो गीत तो लिखेगा पर समझौता करके नही. मुंबई ही वह जगह थी जहा कैफ़ी को अपनी जीवनसंगिनी शौकत मिली जो की ना सिर्फ़ बेहद अमीर थी बल्कि साहित्यिक संस्कारों से परिपूर्ण थी. अपने प्रेमी कैफ़ी को वो इतना चाहती थी की मई 1947 मे जब दोनो का विवाह हुआ तो दक्षिण मुंबई के चाल मे भी रहने को तैयार हो गयी. खेतवाड़ी के उसी चाल मे शबाना और बाबा का जन्म हुआ. 1951 मे आई फिल्म 'बुजदिल' से जो लेखनी सुरू हुई वा उनके अंतिम समय तक जारी रही.



"इतना तो ज़िंदगी में किसी की खलल पड़े" जैसे घंभीर ग़ज़ल उन्होने सिर्फ़ 11 साल की उम्र मे लिखा था. 'बुजदिल' के बाद उन्होने कई फ़िल्मो के लिखा जिनमे 'यहूदी की बेटी' (1956), 'परवीन' (1957), 'मिस पंजाब मैल' (1958), 'ईद का चाँद' (1958) प्रमुख है. फिर वो दौर भी आया जब ख्वाजा अहमद अब्बास और बिमल रॉय जैसे सरीखे निर्देशक हिंदी फिल्म को ऊँचाइयों पर ले जा रहे थे और साहिर लुधियानवी, जान निसार अख़्तर, मजरूह सुल्तानपुरी जैसे गीतकारो की बीच कैफ़ी ऐसे गीत लिख रहे थे जो की आज भी ताज़गी का एहसास दिलाते है.



कैफी की भावुक, रोमांटिक और प्रभावी लेखनी से प्रगति के रास्ते खुलते गए और वे सिर्फ गीतकार ही नहीं बल्कि पटकथाकार के रूप में भी स्थापित हो गए. ‘हीर-रांझा’ कैफी की सिनेमाई कविता कही जा सकती है. सादगीपूर्ण व्यक्तित्व वाले कैफी बेहद हँसमुख थे, यह बहुत कम लोग जानते हैं.

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कैफ़ी आज़मी ने कहानी लेखक के रूप में फ़िल्मों में भी प्रवेश किया. 'यहूदी की बेटी' और 'ईद का चांद' उनकी लिखी आरंभिक फ़िल्में थीं. उन्होंने 'गरम हवा' और 'मंथन जैसी फ़िल्मों में संवाद भी लिखें.


एक गीतकार के रूप मे उन्होने कई हिट और नायाब फ़िल्मो के गाने लिखे जिनमे 'काग़ज़ के फूल' (1959), चेतन आनंद' की 'हक़ीक़त' (1964), 'अनुपमा' (1966), 'उसकी कहानी' (1966), 'सात हिंदुस्तानी' (1969), 'शोला और शबनम', 'परवाना' (1971), 'बावरची' (1972), 'पाकिज़ा' (1972), 'हंसते ज़ख़्म' (1973), 'अर्थ' (1982), 'रज़िया सुल्तान' (1983) प्रमुख रूप से गिनी जा सकती है इसके अलावा फिल्म 'नसीम' (1995) मे उन्होने एक पिता की जिवंत भूमिका भी निभाई.



वर्ष 1973 में मष्तिष्क पक्षघात (ब्रेनहैमरेज) से लड़ते हुए जीवन को एक नया दर्शन मिला - बस दूसरों के लिए जीना है. अपने गाँव मिजवान में कैफी ने स्कूल, अस्पताल, पोस्ट ऑफिस और सड़क बनवाने में मदद की.



उत्तरप्रदेश सरकार ने सुल्तानपुर सड़क को कैफी मार्ग घोषित किया है. इसके अलावा मुंबई उनके नाम से है कैफ़ी आज़मी पार्क भी है जो उन्हे दिए गये सम्मान का प्रतीक है.  जिंदा और सलीकेदार शायरी में मधुर गीत रचकर 10 मई 2002 को कैफी यह गुनगुनाते हुए इस दुनिया से चल दिए : ये दुनिया, ये महफिल मेरे काम की नहीं...!!!!!!!

कैफ़ी आज़मी ने आधुनिक उर्दू शायरी में अपना एक ख़ास स्थान बनाया. कैफ़ी आज़मी की नज़्मों और ग़ज़लों के चार संग्रह हैं:-

    झंकार
    आखिरे- शब
    आवारा सिज्दे
    इब्लीस की मजिलसे शूरा



कैफ़ी आज़मी को अपनी विभिन्न प्रकार की रचनाओं के लिये कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. 1975 कैफ़ी आज़मी को आवारा सिज्दे पर साहित्य अकादमी पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से सम्मानित किये गये तो साथ ही 1970 सात हिंदुस्तानी फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार 1975 'गरम हवा' फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ वार्ता फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार

कैफी के प्रमुख गीत-

    मैं ये सोच के उसके दर से उठा था...(हकीकत)
    है कली- कली के रुख पर तेरे हुस्न का फसाना...(लालारूख)
    वक्त ने किया क्या हसीं सितम... (कागज के फूल)
    इक जुर्म करके हमने चाहा था मुस्कुराना... (शमा)
    जीत ही लेंगे बाजी हम तुम... (शोला और शबनम)
    तुम पूछते हो इश्क भला है कि नहीं है... (नकली नवाब)
    राह बनी खुद मंजिल... (कोहरा)
    सारा मोरा कजरा चुराया तूने... (दो दिल)
    बहारों...मेरा जीवन भी सँवारो... (आखिरी रात)
    धीरे- धीरे मचल ए दिल- ए- बेकरार... (अनुपमा)
    या दिल की सुनो दुनिया वालों... (अनुपमा)
    मिलो न तुम तो हम घबराए... (हीर-रांझा)
    ये दुनिया ये महफिल... (हीर-रांझा)
    जरा सी आहट होती है तो दिल पूछता है... (हकीकत)