Life and Journey of Superstar

दुर्गा खोटे पर्दे की बहु आयामी अभिनेत्री
 durga khote - Copy.jpg                                  बॉलीवुड के फिल्म इतिहास की बात होती है तो हम बात शीर्ष नायको से शुरू करके ग्लैमरस अभिनेत्रियो तक सिमट जाता है पर इस विशाल इमारत की नीव और दिवार मै कुछ ऐसी ईटे लगी जिनके बिना सिनेमा के अदभुत दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती कई चारित्रिक किरदारों ने सिनेमा की कहानी को दर्शको से जोड़ा कुछ इस तरह से अभिनेत्री दुर्गा खोटे का किरदार और फ़िल्मी सफ़र था. हिंदी एव मराठी फिल्मो के अलावा रंगमंच की दुनिया मै करीब पञ्च दशक तक सक्रीय रही दुर्गा खोटे अपने दौर की प्रमुख हस्तियों मै थी दुर्गा खोटे ने करीब 200 फिल्मो के साथ ही सैकड़ो नाटको मै भी अभिनय किया और फिल्मो के लेकर सामाजिक वर्जनाओ को दूर करने मै अहम् भूमिका निभाई.हिंदी फिल्मो मै उन्हें माँ की भूमिका के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है. फ़िल्मकार के आसिफ की बहुचर्चित फिल्म मुगल...ए..आज़म मै जहां उन्होंने सलीम की माँ जोधाबाई की यादगार भूमिका निभाई वाही उन्होंने विजय भट्ट की भरत मिलाप मै कैकेई की भूमिका को जिवंत बना दिया बतौर माँ उन्होंने चरणों की दासी मिर्झा ग़ालिब,बॉबी, विदाई जैसी फिल्मो मै बेहतरीन भूमिका निभाई. दुर्गा खोटे  ऐसे समय में बॉलीवुड आई जब उस दौर में महिलाओ की अधिकतर भूमिकाएं भी पुरुष ही निभा रहे थे, के आसिफ की 'मुग़ल ए आजम' में दुर्गा खोटे की जोधा की भूमिका , 'बॉबी' में नायिका की दादी और 'अभिमान' में हीरो की चाची की भूमिका को दर्शको ने खूब सराहा. सन 1930 में श्री  मोहन भवनानी वाडिया  के साथ एक मुख फिल्म बना रहे थे.फिल्म लगभग पूरी भो चुकी थी. उसियो समय बोलती फिल्मो की लहर ने भवनानी को इसी फिल्म में एक खास किरदार जोड़ने के लिए विवश किया जिसके लिए वो एक नयी युवती चाहते थे. यह कार्य उन्होंने वाडिया को सौप दिया. वाडिया शालिनी के मित्र थे. उन्होंने उस भूमिका हेतु शालिनी के समक्ष प्रस्ताव रखा जिसे शालिनी ने तुरन्त अस्वीकार कर दिया. काफी आग्रह करने पर उन्होंने अपनी छोटी बहन दुर्गा का नाम प्रस्तावित किया तथा वाडिया को वह दुर्गा के पास भी ले गई. परिस्थितिवश दुर्गा खोते ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. इस प्रकार दुर्गा को प्रथम फिल्म 'ट्रैप्ड' उर्फ़ 'फरेबी जाल' (1931) में सिर्फ दस मिनट की भूमिका मिली जिसमे उनके गाए 3 गीत भी सम्मिलित थे. फिल्म की शूटिंग पूरी होने पर उन्हें 250 रुपये का चेक मिला जिससे उस समय उनके आवश्यक खर्चे निकल आये फिल्मो में संभ्रांत महिलाओ के लिए रह आसान बनाने वाली दुर्गा खोटे ने मूक फिल्मो से आधुनिक दौर की फिल्मो तक अपनी लम्बी अभिनय यात्रा में मुगले आजम, बावर्ची आदि फिल्मो में कई यादगार भूमिकाएं निभाई और उन्हें फिल्मो सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
दुर्गा खोटे ऐसे समय में फिल्मो में आने के लिए विवश हुई जब इस क्षेत्र को प्रतिष्ठित परिवार परिवार अच्छी नजर से नहीं देख रहे थे और उनके परिवार की लडकियों को फिल्मो में काम करने की मनाई थी. पारंपरिक मूल्यों में भरोसा रखने वाले एक ब्राम्हण परिवार में 14 जनवरी 1905 को पैदा हुई दुर्गा खोटे के  साथ विधाता ने कम उम्र में ही क्रूर मजाक किया क्योंकि उनके पति का युवावस्था में ही निधन हो गया. उन्हें अपनी दो बच्चो की परवरिश के लिए फिल्मो की राह लेनी पड़ी.वह दौर मूक फिल्मो का था और बोलती फिल्मो के लिए प्रयास शुरू हो चुके थे दुर्गा खोटे भलेही विवशता वश इस क्षेत्र में आई लेकिन उन्होंने इसके सारे उन मान्यताओ को तोड़ दिया जिसके तहत सम्मानित परिवार की महिलाएं सिनेमा में अभिनाक्य नहीं कर सकती थी. दुर्गा खोटे की शुरआत छोटी भूमिकाओ से हुई पर जल्द ही उन्होंने नायिका की भूमिका निभानी शुरू कर दी और 1932 में प्रदर्शित प्रभात फिल्म्स की अयोध्येचा राजा फिल्म्स ने उन्हें स्थापित कर दिया. मराठी और हिन्दी में बनी इस फिल्म में उन्होंने रानी तारामती की भूमिका अदा की थी.
वह दौर स्टूडियो सिस्टम का था जिसमे कलाकार मासिक वेतन पर किसी स्टूडियो के लिए काम करते थे. लेकिन आत्मविश्वासी दुर्गा खोटे ने यहां भी प्रचलित मान्यताओं को दरकिनार कर फ्रीलांस आधार पर काम करना शुरू किया. इसके साथ ही उन्होंने न्यू थियेटर्स ईस्ट इंडिया फिल्म कंपनी प्रकाश पिक्चर्स आदि के लिए भी काम किया. दुर्गा खोटे 1930 के समाप्त होते -होते निर्माता और निर्देशक भी बन गयी और साथ ही फिल्म का निर्माण भी किया. बतोर कलाकार 1940 का दशक उनके लिए काफी अच्छा रहा और उनकी एक के बाद एक कई फिल्मोने कामयाबी के परचम लहराए. इन फिल्मो में चरणों की दासी ,भरत मिलाप आदि शामिल है. इन फिल्मो के लिए जहा उन्हें समीक्षकों की ओर से सराहना मिली वाही कई पुरस्कार भी मिले.
durga-khote 1.jpgफिल्मो में अभिनय के साथ ही दुर्गा खोटे रंगमंच खासकर मराठी से भी सक्रीय रूप से जुडी रही. वे इंडियन पीपल्स थियेटर एसोशियन (इप्टा) से जुडी रही थी. उन्होंने मुंबई मराठी साहित्य संघ के लिए कई नाटको में काम किया. महँ नाटककार शेक्सपिअर की बहुचर्चित कृति मेकबेथ पर आधारित मराठी नाटक राजमुकुट में उन्होंने बेहतरीन अभिनय किया. वर्ष 1931 में शुरू हुआ दुर्गा खोटे का फ़िल्मी सफ़र कई दर्शको का रहा और इस दौरान उन्होंने विविध प्रकार की यादगार भूमिकाऐ की. इससे न सिर्फ पुरुष वर्चस्व फिल्म जगत में महिलाओ की स्तिथि बेहतर हुई बल्कि संभ्रात परिवार की महिलाओ के लिए सिनेमा की रह आसन हो गई. दुर्गा खोते ने अभिनय के क्षेत्र मे अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया ही, उन्होंने एक और पहल करते हुए स्टूडियो व्यवस्था को भी अस्वीकार कर दिया और एक साथ कई कंपनियो के लिए काम करते हुए हिन्दी फिल्मो में फ्रीलांसिंग व्यवस्था को ठोस बनाने में अहम् भूमिका निभाई. सिनेमा क्षेत्र में उनके योगदान के लिए दुर्गा खोटे को देश के सर्वोच्च फिल्म सम्मान दादा साहब फालके पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया.
उम्र बढ़ने के साथ वह चरित्र भूमिकाओ में आने लगी और कई ऐसे किरदार निभाए जिसकी आज भी चर्चा होती है. ऐसी फिल्मो में के. आसिफ की मुगले आजम, राज कपूर की बॉबी ऋषिकेश मुखर्जी की बावर्ची में भाबी का रोले आदि शमिल है. बहुचर्चित फिल्म मुग़ले आजम में उन्होंने अकबर की पत्नी की भूमिका निभाई जी पति और पुत्र सलीम के द्वंद्व के बीच उलझी हुई है. 
पति और पुत्र के बीच अपने कर्तव्य को लेकर दुविधा में उलझी इस भूमिका को उन्होंने यादगार दिया. 1971 से 1977 तक दुर्गा खोटे ने काफी फिल्मो आर्थिक भूमिका की एक दौर ऐसा भी आया की हर दूसरी फिल्म में वो नजर आने लगी जिनमे नमक हराम,अभिमान, पहली खास रूप से गिनी जा सकती है कर्ज उनकी आखरी बड़ी फिल्म थी. अभिनय को अलविदा करने के बाद भी वे सक्रीय रही और लघु फिल्मो, विज्ञापन फिल्मो,वृत्तचित्रो के निर्माण से जुडी रही. उन्होंने मराठी में आत्मकथा भी लिखी जिसका अंग्रेजी में अनुवाद आई दुर्गा खोटे नाम से प्रकाशित हुआ. 
दुर्गा खोटे 22 सितंबर 1991 को इस दुनिया को हमेशा हमेशा के लिए अलविदा कह गई लेकिन उन्होंने फिल्म और अभिनय क्षेत्र में महिलाओ के लिए एक नया मार्ग खोल कर गई साथ ही अपने यादगार भुमिका से वो हमारे बीच सदा के लिए अपनी छाप छोड़ कर गई.. --