Life and Journey of Superstar

"एक संवेदनशील किरदारों की जीवंत अभिनेत्री सुप्रिया पाठक"
sp - Copy.JPG                            एक ही परिवार में जहाँ तीन अभिनेत्री ( माँ दिना पाठक, बड़ी बहन रत्ना पाठक और खुद सुप्रिया पाठक ) हो तो सहज रूप से अंदाज लगाया जा सकता है की यह परिवार फिल्म और अभिनय में कितना दिलचस्प होगा. हम बात कर रहे है पाठक परिवार की जिसमें से तीन जानी मानी अभिनेत्रियों ने बड़े पर्दे, छोटे पर्दे, और नाटकों में अपनी अदाओं से एक अलग पहचान बनायीं माँ दिना पाठक, बड़ी बहन रत्ना पाठक और खुद सुप्रिया पाठक, असल में सुप्रिया को कभी अदाकारी का शौक नहीं रहा. वह तो नालंदा विश्वविद्यालय से डांस विषय में स्तानक डिग्री लेने के बाद डांस में ही  पीएचडी करने वाली थी.
चूँकि परिवार में माँ दिना पाठक फिल्मो के साथ ही साथ स्टेज आर्टिस्ट थी, लिहाजा एक दिन उन्होंने एक नाटक में हिस्सा लेने का आग्रह किया, जिसे सुप्रिया टाल नहीं सकी. इस नाटक में उनके अभिनय की क्षमता के चर्चे होने लगे फिर धीरे - धीरे खुद सुप्रिया को अदाकारी में आनंद आने लगा. इस तरह डांस में करियर बनाने का सपना पीछे छुटता चला गया. सुप्रिया को पहली फिल्म का ऑफर घर बैठे ही मिला और तब वह पढाई कर रही थी, 1981 में बनी फिल्म कलयुग से उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर का आगाज किया इस फिल्म के लिए उन्हें सहनायिका का फिल्म फेयर का पुरकर मिला हर वर्ष उनकी एक से एक उम्दा फिल्म आती गई.
अस्सी के दशक में कलयुग के बाद बाजार (1982) मदहोश (1994) कमला की मौत (1990) दाता (1989) राख (1989) sannata2.jpgफलक (1988) शहंशाह (1988) मिर्चमसाला (1987) दिलवाला (1986) झूठी (1986) अर्जुन (1985) बहु की आवाज (1985) आवाज (1984) धर्म और कानून (1984) विजेता (1983) गाँधी (1983) बेक़रार (1983) मासूम (1983) बहु हो तो ऐसी (1982) जैसी फिल्मे खास रही.
सागर सरहदी की बहुचर्चित फिल्म 'बाजार' सुप्रिया पाठक के फ़िल्मी करियर की एक खास फिल्म साबित हुई दरसल सागर सरहदी ने इस किरदार के लिए सुप्रिया का चुनाव किया उस समय सागर सरहदी ने सुप्रिया को फिल्म के बारे में कुछ यु बताया था, "मै एक फिल्म बना रहा हूँ 'बाजार'. मैंने कई लड़कियों के टेस्ट लिए है लेकिन कोई जम नहीं रही है. मुझे लगता है की तुम मेरी फिल्म में फिट रहोगी. सुप्रिया ने संक्षेप में फिल्म की कहानी सुनी और फिर काम करने के लिए हाँ कर दी.लेकिन फिल्म की शूटिंग शुरू होनी थी और सुप्रिया पाठक की परिक्षाए भी शुरू हो गई थी.फिल्म की शूटिंग के लिए सब ट्रेन से हैदराबाद जा रहे थे, और तब सुप्रिया जी ने कहा की वह नहीं आ सकती उनकी परिक्षाए शुरू है. तब सागर जी ने उन्हें प्लेन का फेयर दिया और कहा की परीक्षा के बाद वह हैदराबाद पहुच जाएं. फिर सुप्रिया जी ने अपनी परीक्षाएं ख़त्म करके हैदराबाद पहुंचकर शूटिंग में हस्सा लिया.
जब 'बाजार' फिल्म की शूटिंग हो रह थी, तब खुद सागर सरहदी साहब ही नहीं, स्मिता पाटिल, नसीरुद्दीन शाह और फारुख शेख को भी उम्मीद नहीं थी कि यह फिल्म इतनी कामयाब होगी. उसका यह संवाद 'सज्जो हम गरीब न होते तो हमें कोई अलग नहीं कर सकता था', यह आज भी याद है. वाकई एक बेहतरीन फिल्म थी बाजार.
supriya-pathak.jpgफ़िल्मी करियर के साथ अभिनेता पंकज कपूर के साथ उनकी शादी का सफ़र भी दिलचस्प है. पंकज कपूर से उनकी मुलाकात कश्मीर में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान हुई. पहली ही नजर में उनके बीच एक खास रिश्ता कायम हो गया था यह बात भी दिलचस्प है कि जिस फिल्म में वह दोनों पहली बार काम कर रहे थे, वो कभी परदे पर आई ही नहीं. करीब दो साल साथ रहने के बाद आखिर सुप्रिया पाठक ने पंकज कपूर के साथ शादी कर ली.
नब्बे के दशक के बाद सुप्रिया बड़े पर्दे से दूर हो गयी और अपने अभिनय का सफ़र टेलीविजन पर केन्द्रित कर दिया हालाकि वह अस्सी के दशक में ही छोटे पर्दे से जुड़ गयी थी लेकिन शादी के बाद उनका पूरा ध्यान छोटे पर्दे पर आ गया. दर्पण, कथा सागर, जिंदगी इधर उधर, जैसे धारावाहिक ने उन्हें छोटे पर्दे पर लोकप्रियता दिलाई.
(1999) जैसे धारावाहिक में लोकप्रिय किरदार निभाने के बाद सुप्रिया पाठक ने भारतीय टेलीविजन के मशहूर धारावाहिक खिचड़ी के किरदार हंसा बेन का कभी ना भुलानेवाला किरदार निभाया. मुझे आतिश कपाडिया ने छोटे पर्दे पर धारावाहिक 'खिचड़ी' में एक बेवकूफ महिला हंसा का किरदार जिसे सिर्फ तीन चीजों से प्यार है.…गहने, गजरा और प्रफुल्ल बहुत ही दिलचस्प रहे. इस किरदार के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेत्री का इंडियन टेली अवार्ड 2003 दिया गया.
बड़े पर्दे पर सुप्रिया एक बार फिर 2005 में फिल्म सरकार में नजर आई. अमिताभ बच्चन की पत्नी के साथ पुष्पा नागरे के तौर पर उनकी भूमिका काफी सशक्त थी. हालाँकि उनके हिस्से काफी संवाद या दृश्य नहीं थे, लेकिन एक बार फिर उनके प्रशंसको को एक बार फिर बड़े पर्दे पर देखने का अवसर मिला इसके बाद पंगा न ले ( 2007), धर्म (2007), सरकार राज (2008), दिल्ली 6 (2009) में उनकी उपस्तिथि पर्दे पर अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रही. लेकिन फिल्म 'वेक अप chs.jpgसीड' (2009) में रणबीर कपूर की माँ सरिता मेहरा के तौर पर एक बेहद ही संवेदन शील माँ का किरदार निभाया इस किरदार के लिए उनका नाम सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री, फिल्म फेयर के लिए नामांकित अभिनेत्री नामांकित अभिनेत्री भी किया गया.अपने पति पंकज कपूर की फिल्म 'मौसम' में भी फातिमा बुआ का किरदार भावात्मक था तो पिछले साल प्रदर्शित फिल्म शंघाई में वह फारुख शेख के साथ नजर आई जिनके साथ करियर की शुरवात में सबसे जादा फ़िल्में की थी.
अपनी निजी जिंदगी में बहुत ही साधारण और जमीन से जुडी सुप्रिया स्टारडम से दूर रहती है और बॉलीवुड में अपने सफ़र को बेहद ही सरल शब्दों में बताती है, कि मै बहुत भाग्यशाली हूँ की बॉलीवुड में मुझे कई अच्छी फ़िल्में मिली, लेकिन इसमें कभी माँ ने कोई सिफारिश नहीं की. मैंने जो भी किरदार निभाए वह उस फिल्म के हिसाब से निभाए. मसलन फिल्म 'बाजार' में एक गरीब लड़की जो बहुत सहमी - सहमी रहती है, कंधे निचे झुककर चलती है,वही दूसरी तरफ फिल्म 'विजेता' में दबंग लड़की की भूमिका निभाई. जबकि फिल्म 'मिर्च मसाला' में एक गुजरती लड़की कैसी होती है, उसके रंग में ढल गयी.
छोटे पर्दे पर सुप्रिया पाठक आज कल 'छन छन' धारावाहिक में नजर आ रही है. जिसके निर्माता विपुल शाह है. तो बड़े पर्दे पर वह संजय लीला भंसाली की बहु प्रतीक्षित फिल्म 'रामलीला' में नजर आएँगी. भारतीय फिल्म और टेलीविजन में अपने अभिनय की अमित छाप छोड़ने वाले निराले कलाकारों में सुप्रिया पाठक का नाम हमेशा एक अलग पहचान रखेगा.