Life and Journey of Superstar

मखमली आवाज के जादूगर थे जगजीत सिंह !
            Jagjit-Singh_05.jpg      स्वर्गीय जगजीत सिंग जी क़ी आवाज किसी हिम आच्छादित पर्वत पर उतरते हुवे नर्म सफेद बादलो जैसी थी जो पर्वत से गले मिलकर कंही खो जाता है किसी को भी नही पता चलता  है बस रह जाता है तो उसका एक एह्सास जिसे शब्दो मे व्यक्त करना मुश्किल था उनकी अवाज को  मखमली आवाज कि उपमा दी गयी तो गजल को आम आदमी से जोडने का काम भी उन्होने ही किया इसिलिये भारतीय संगीत मे  उनकी तुलना किसी से भी नही कि जा सकती है . जगजीत सिंह  का जन्म 8 फरवरी ( 1941)  को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। पिता सरदार अमर सिंह धमानी भारत सरकार के कर्मचारी थे। जगजीत जी का परिवार मूलतः पंजाब के रोपड़ ज़िले के दल्ला गांव से ताल्लुक रखता था । मां बच्चन कौर पंजाब के ही समरल्ला के उट्टालन गांव की रहने वाली थीं। जगजीत जी का बचपन का नाम जीत था । शुरूआती शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद में पढ़ने के लिए जालंधर आ गए। डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया. पिता के इजाज़त के बग़ैर फ़िल्में देखना और टॉकीज में गेटकीपर को घूंस देकर हॉल में घुसना आदत थी।


बचपन से ही उन्हें अपने पिता से संगीत विरासत में मिला। गंगानगर मे ही पंडित छगन लाल शर्मा के सानिध्य में दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखने की शुरूआत की। आगे जाकर सैनिया घराने के उस्ताद जमाल ख़ान साहब से ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियां सीखीं। पिता की ख़्वाहिश थी कि उनका बेटा भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में जाए लेकिन जगजीत पर गायक बनने की धुन सवार थी। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान संगीत मे उनकी दिलचस्पी देखकर कुलपति प्रोफ़ेसर सूरजभान ने जगजीत सिंह जी को काफ़ी उत्साहित किया। उनके ही कहने पर वे १९६५ में मुंबई आ गए। यहां से संघर्ष का दौर शुरू हुआ। वे पेइंग गेस्ट के तौर पर रहा करते थे और विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर या शादी-समारोह वगैरह में गाकर रोज़ी रोटी का जुगाड़ करते रहे। १९६७ में जगजीत जी की मुलाक़ात चित्रा जी से हुईजो क़ी दो साल बाद दोनों १९६९ में परिणय सूत्र में बंध गए।


जगजीत सिंह फ़िल्मी दुनिया में प्लेबैक सिंगिंग (पार्श्वगायन) का सपना लेकर आए थे। उन दिनों तलत महमूद , मोहम्मद रफ़ी साहब जैसों के गीत लोगों की पसंद हुआ करते थे। रफ़ी-किशोर-मन्नाडे के दौर में पार्श्व गायन का मौक़ा मिलना बहुत दूर था।  इसीलिए जगजीत सिंह  अपने निजि एलबम पर काम करना शुरु कर दिये और पहला एलबम ‘द अनफ़ॉरगेटेबल्स (१९७६)’ हिट रहा। सरदार जगजीत सिंह धीमान इसी एलबम के रिलीज़ के पहले जगजीत सिंह बन चुके थे। बाल कटाकर एक नये अंदाज में एक असरदार जगजीत सिंह बनने की राह पकड़ चुके थे।


१९८१ में रमन कुमार निर्देशित ‘प्रेमगीत’ और १९८२ में महेश भट्ट निर्देशित ‘अर्थ’  में दो ऐसे फिल्मी गीत है जिन्होने जगजीत सिंग को हमेशा के लिये अमर कर दिया । जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को जब फ़िल्मी गानों की तरह गाना शुरू किया तो आम आदमी ने ग़ज़ल में दिलचस्पी दिखानी शुरू की लेकिन ग़ज़ल के जानकारों की भौहें टेढ़ी हो गई। ख़ासकर ग़ज़ल की दुनिया में बेग़म अख़्तर, कुन्दनलाल सहगल, तलत महमूद, मेहदी हसन जैसों का दबदबा था.। दरअसल यह वह दौर था जब आम आदमी ने जगजीत सिंह, पंकज उधास सरीखे गायकों को सुनकर ही ग़ज़ल में दिल लगाना शुरू किया था। दूसरी तरफ़ परंपरागत गायकी के शौकीनों को शास्त्रीयता से हटकर नए गायकों के ये प्रयोग चुभ रहे थे। प्रयोगों का सिलसिला यहीं नहीं रुका बल्कि तबले के साथ ऑक्टोपेड, सारंगी की जगह वायलिन और हारमोनियम की जगह कीबोर्ड ने भी जगह ली। जलाल आग़ा निर्देशित टीवी सीरियल कहकशां के इस एलबम में मजाज़ लखनवी की ‘आवारा’ नज़्म ‘ऐ ग़मे दिल क्या करूं ऐ वहशते दिल क्या करूं’ और फ़ेस टू फ़ेस में ‘दैरो-हरम में रहने वालों मयखानों में फूट न डालो’बेहतरीन प्रस्तुति थीं। इतना ही नहीं, जगजीत जी ने क्लासिकी शायरी के अलावा साधारण शब्दों में ढली आम-आदमी की जिंदगी को भी सुर दिए। ‘अब मैं राशन की दुकानों पर नज़र आता हूं’, ‘मैं रोया परदेस में’, ‘मां सुनाओ मुझे वो कहानी’ जैसी रचनाओं ने ग़ज़ल नसुनने वालों को भी अपनी ओर खींचा।


शायर बशीर बद्र जगजीत सिंह जी के पसंदीदा शायरों में थे और वे निदा फ़ाज़ली के दोहों का एलबम ‘इनसाइट’ कर चुके। जावेद अख़्तर के साथ ‘सिलसिले’ ज़बर्दस्त कामयाब रहा। लता मंगेशकर जी के साथ ‘सजदा’, गुलज़ार के साथ ‘मरासिम’ और ‘कोई बात चले’,कहकशां, साउंड अफ़ेयर, डिफ़रेंट स्ट्रोक्स और मिर्ज़ा ग़ालिब अहम हैं। जगजीत जी ने राजेश रेड्डी, कैफ़ भोपाली, शाहिद कबीर जैसे शायरों के साथ भी काम किया था .


जगजीत सिंग के निजी अल्बम बहुत लोक्प्रिय रहे जैसे बियोंड टाइम  (1987) क्राई फार क्राई (1995) डिसाइर्स (1994) एक्स्टसीज (1994) ओन्कोर  (1993),एटर्निटी( (1997) फ़ेस टू फ़ेस (1993) होप (Hope) (1991), इन हारमोनी(In Harmony), इन सर्च(1992) इनसाइट (1994), जाम उठा (1996), कहकशां (1991), द लेटेस्ट (1982), लाइव एट रॉयल अल्बर्ट हॉल (1983), लाइव इन कॉन्सर्ट एट वेम्बली (1981) लाइव इन कॉन्सर्ट (1987), लव इस (1997), मैं और मेरी तंहाई (1981), मारीशम (1999), अ माइलस्टोन (1980)मिराज (1995), मिर्जा गालिब (1988), शहर (2000) शज़दा (1991),सिलसिले (1998)समवन समवेहर 1990) ए सांउड अफेअर (1985), टूगेदर (1999) के साथ किया और भी कई संग्रह है जो बहुत पसंद किये गये.
 
फिल्म ‘अर्थ’ में जगजीत सिंग जी ने ही संगीत दिया था। । बतौर फिल्म संगीतकार  उन्होने १९९४ में ख़ुदाई, १९८९ में बिल्लू बादशाह, १९८९ में क़ानून की आवाज़, १९८७ में राही, १९८६ में ज्वाला, १९८६ में लौंग दा लश्कारा, १९८४ में रावण और १९८२ में सितम जैसी फिल्मे क़ी लेकिन वे न तो संगीत और ना ही किसी  वजह से ध्यान आकर्षित कर पाए  लेकिन दुसरी तरफ  पार्श्वगायक जगजीत जी सुनने वालों के हमेशा पसंदीदा रहे थे ।


फिल्मो मे उंनके गीत ‘प्रेमगीत’ का ‘होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो’ ‘खलनायक’ का ‘ओ मां तुझे सलाम’ ‘दुश्मन’ का ‘चिट्ठी ना कोई संदेश’ ‘जॉगर्स पार्क’ का ‘बड़ी नाज़ुक है ये मंज़िल’ ‘साथ-साथ’ का ‘ये तेरा घर, ये मेरा घर’ और ‘प्यार मुझसे जो किया तुमने’ ‘सरफ़रोश’ का ‘होशवालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है’ ‘ट्रैफ़िक सिगनल’ का ‘हाथ छुटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते’ (फ़िल्मी वर्ज़न) ‘तुम बिन’ का ‘कोई फ़रयाद तेरे दिल में दबी हो जैसे’  ‘तरक़ीब’ का ‘मेरी आंखों ने चुना है तुझको दुनिया देखकर’ (अलकायाज्ञनिक के साथ) काफी लोकप्रिय हुए थे .


कोमल आवाज के साथ ही वह मुलायम दिल के भी मालिक थे। पहले युवा बेटे की मौत और फिर बेटी की आत्महत्या ने उन्हें भीतर से कमजोर कर दिया था।  व्यावसायिक दबावों को वे सहन ना कर सके और उन्हें ब्रेन हेमरेज हो गया। गजल के बादशाह कहे जानेवाले स्वर्गीय जगजीत सिंह का १० अक्टूबर २०११ की सुबह 8 बजे मुंबई में देहांत हो गया.  इसे उनकी संगीत और गीत के प्रति तल्लिन्न्ता हि कह सकते है कि जिस दिन उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ, उस दिन भी वे गजल गायक गुलाम अली के साथ एक शो की तैयारी कर रहे थे। 


ऐसे मखमली आवाज के जादूगर को बॉलीवुड ब्लॉग परिवार क़ी तरफ से स्वर्गीय जगजीत सिंग को भावभीनी श्रधांजलि !