Life and Journey of Superstar

महिलाओं के बीच बहुत लोकप्रिय थे जॉय मुखर्जी !
        Joy.jpg   बीते मार्च महीने ने एक बार फिर हमें बॉलीवुड के एक और सितारे को दूर कर दिया . साठ और सत्तर के दशक में अपनी अभिनय से रोमांटिक फिल्मों के जरिए दर्शको में पहचान बनाने वाले अभिनेता जॉय मुखर्जी हमारे बिच अब नहीं रहे .जॉय मुखर्जी एक फिल्म पारिवारिक पृष्ठभूमि से थे . मामा अशोक कुमार और किशोर कुमार थे तो आज उनकी भतीजी काजोल और भांजी रानी मुखर्जी हिंदी फिल्मों में काम कर रही है उनके पिता शशधर मुखर्जी एक फिल्म निर्माता थे और मुंबई स्थित फिल्मिस्तान स्टूडियो की स्थापना में भी उनका बहुत बड़ा योगदान था .जॉय महिलाओं के बीच बहुत लोकप्रिय थे .उनका रोमांटिक व्यक्तित्व किसी को भी दीवाना बना देता था .

फिल्मों में प्रवेश करना उनके लिए कभी मुश्किल नहीं रहा . कैरियर की शुरुआत पिता शशधर के होम प्रोडक्शन की फिल्म 'लव इन शिमला 'से हुई .१९९० में बनी यह फिल्म जॉय मुखर्जी के साथ ही अभिनेत्री साधना के लिए अत्यंत सफल साबित हुई . लव इन शिमला में बतौर देव की भूमिका में जॉय का अभिनय दर्शकों को बहुत पसंद आया . फिल्म 'लव इन शिमला 'के लिए पटकथा और संवाद लिखनेवाले आगाजानी कश्मीरी (आगाजानी और कशमीरी) ने जॉय मुखर्जी के पिता शशधर को एक कहानी सुनाई .एक शाम जब दोनों इस बात पर चर्चा कर रहे थे की 'लव इन शिमला 'में मुख्य भूमिका कौन निभाएगा ?बतौर निर्माता शशधर शम्मी कपूर को लेने को उत्सुक थे .लेकिन आगा जानी की निगाहें जॉय पर थी जो बंबई विश्वविधालय से अपनी पढ़ाई पूरी कर घर आया था . जॉय की शारीरिक व्यक्तित्व की ओर इशारा किया और कहा, "लो ,यह रहा तुम्हारा हीरो ." और उन्होंने आगा जानी से पूछा की क्या वह को अभिनय की शिक्षा देने और जरुरी प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी लेंगे तो आगा जानी इस पर सहमत हो गए .और बॉलीवुड को एक नया हीरो पेश किया गया .
निर्देशक आर. के. नैय्यर की फिल्म 'लव इन शिमला ' के बाद जॉय को कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा . लेकिन वह फिल्मों के चुनाव में शुरू में से आशातीत सफलता नहीं मिली .लेकिन एक बार फिर 'एक मुसाफिर एक हसीना ' (१९६२) में सफलता के साथ फिल्म 'फिर वही दिल लाया हूं ' (१९६२) में मोहन की भूमिका को दर्शकों का भरपूर प्यार मिला तो १९६३ और १९५५ में उन्होंने टोकियों '. 'जिद्दी' (१९६४) उनकी सबसे सफल फिल्मो में गिनी जाती है. उन्होंने बहुत ही कम अवधि में अनेक फिल्मों में अपने अभिनय का परचय लहराया .फिल्मों में वह एक प्रेमी की भूमिका में बेहद सफल रहे लेकिन जब भी उन्होंने इससे कुछ हटकर किया तो वह सफल नहीं रहे . उनके फिल्म कैरियर को फिल्म 'आओं प्यार करे ' (१९६४) 'दूर की आवाज '(१९६४ ) 'इशारा'(१९६४) 'जी चाहता है '(१९६४) 'बहू बेटी '(१०६५) 'साज और आवाज (१९६५) 'ये जिंदगी कितनी हसीन है '(१९६६) 'लव इन टोकियो ' (१९६६) 'शागिर्द ' (१९६८ ) हमसाया ' (१९६७) 'दुपटटा (१९६९) 'पुरस्कार '(१९७०) 'आग और दाग '(१९७०) एहसान '(१९७०) 'इंस्पेक्टर (१९७०) मुजरिम '(१९७०) 'कहीं आर कहीं पार '(१९७१) एक बार मुस्करा दो '(१९७२) के साथ याद किया जाता है इनमे फिल्म 'शागिर्द ' उनकी कैरियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में से ए४क मानी जाती है आशा पारेख , साधना ,माला सिन्हा और सायरा बानो जैसी सफल अभिनेत्रियों के साथ उनकी रोमांटिक जोड़ी बेहद पसंद की गई . तो हिंदी फिल्मों में जॉय के हिस्से कई सुपरहिट गाने आये जिन्हें आज भी लोग बड़े चाव से सुनते हैं . उन पर फिल्माए गए और मोहम्मद रफी के गाए कई गीत आज ही             भी लोगों को पसंद है .जैसे 'फिर वही दिल लाया हूं ,'बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी ', ले गई दिल गुड़िया जापान की ,'दुनिया पागल है या फर मैं दीवाना ,और बड़े मियां दीवाने ऐसे ना बनो ,भला किस संगीत प्रेमी को याद नहीं है 

 सत्तर के दशक में धर्मेन्द्र ,जीतेन्द्र .राजेश खन्ना जैसे अन्य अभिनेताओ की लोकप्रियता बढ़ने लगी .हालांकि जॉय शुरू से ही कम फ़िल्में करते थे लेकिन अब उन्होंने चुनिंदा फ़िल्में करने का निर्णय लिया और साथ ही अभिनय के क्षेत्र में अपनी तकनीक कला के प्रदर्शन के साथ -साथ फिल्मों के निर्माण और निर्देशक की  ओर भी रुख किया . लेकिन फिल्म निर्माण -निर्देशक में भी उन्हें सफलता नहीं मिल पाई फिल्म कैरियर से परे जॉय मुखर्जी ने छोटे पर्दे पर भी अपनी मौजूदगी दर्ज करायी . परदे पर आखिर बार टेलीविजन के जरिए २००९ में धारावाहिक 'ऐ दिले -ए नादान 'में अभिनय किया पिछले मार्च के पहले सप्ताह में उनकी तबियत खराब हो गयी और लीलावती अस्पताल में भर्ती करवाया गया था . ९ मार्च शुक्रवार को सुबह उन्होंने आखिरी सांस ली. लेकिन हिंदी फिल्मों में एक रोमांटिक अभिनेता के तौर पर दर्शको में हमेशा याद किये जाएंगे .