Life and Journey of Superstar

रोमांटिक अभिनेता थे राजेन्द्र कुमार
     rajendra kumar.JPG भारतीय फिल्मों के जुबली कुमार कहे जानेवाले रोमांटिक अभिनेता राजेन्द्र कुमार का जन्म सीयालकोट, पंजाब (अब पाकिस्तान) में 20 जुलाई 1929 में हुआ था. उन्होंने बतौर निर्माता-निर्देशक और अभिनेता अपनी फिल्मों में गहरी छाप रखी है. राजेंद्र कुमार ने अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत 1950 में फिल्म 'जोगन' के साथ की. इस फिल्म में दिलीप कुमार और नरगिस भी थे. इसके बाद वे फिल्म 'वचन दिया', 'तूफान', 'आवाज', 'एक झलक' जैसी फिल्मों में नजर आए. लेकिन यह फ़िल्में असफल रहीं. 1957 में प्रदर्शित फिल्म 'मदर इंडिया' से उन्हें पहचान मिली. इस फिल्म में राजेन्द्र कुमार ने नरगिस के बेटे का किरदार निभाया. फिल्म 'मदर इंडिया' की सफलता के तक़रीबन दो वर्ष के बाद फिल्म 'गूंज उठी शहनाई'  कि सफलता से राजेन्द्र कुमार स्टार बन गए. इस फिल्म के निर्देशक विजय भट्ट थे और नायिका अमृता थीं. वह एक संगीतमय फिल्म थी जिसके गीत आज भी पसंद किए जाते हैं.

           भारतीय फिल्म इतिहास में सत्तर के दशक में राजेन्द्र कुमार सबसे सफल अभिनेता साबित हुए. गायक मोहम्मद रफ़ी राजेन्द्र कुमार कि पर्दे पर आवाज बन गये थे. यह एक ऐसा वक्त था जब एक साथ उनकी छः से ज्यादा फ़िल्में सिल्वर जुबली सप्ताह की सफलता मना रही थी. यह एक ऐसी सफलता थी जिसने उन्हें हिंदी फिल्मों का जुबली कुमार बना दिया.

         फिल्म 'गूंज उठी शहनाई' के बाद 1959 में यश चोपड़ा निर्देशित 'धूल का फूल' भी बहुत पसंद की गयी. यह यश चोपड़ा के निर्देशन पारी की शुरुआत थी. 1963 में 'मेरे महबूब' के बाद राज कपूर द्वारा निर्देशित और अभिनीत फिल्म 'संगम' में भी राजेन्द्र कुमार के अभिनय को पसंद किया गया. इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड के लिए नामांकित किया गया. इसके बाद फिल्म 'आरजू', 'सूरज', 'गंवार' जैसी फिल्म भी उनके कैरियर में अहम् भूमिका निभाई.

       1970 के शुरूआती दशक में आई फिल्मों ने अच्छा व्यवसाय नहीं किया. यह वह समय था जब हिंदी फिल्मों में राजेश खन्ना का आगमन हुआ था. राजेन्द्र कुमार के कैरियर का यह कठिन समय था जिसमें 'गंवार' (1970), 'तांगेवाला' (1972), 'गांव हमारा शहर तुम्हारा' (1972), 'आन बान' (1972) आदि फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल हो गयी.

       इस असफल और मुश्किल भरे वक्त को एक बार राजेन्द्र कुमार ने इंटरव्यू में स्वीकार किया था. यह मुश्किल भरा समय भी बीत गया था. 1978 में उनकी फिल्म 'साजन बिना सुहागन' ने बड़ी सफलता हासिल की. इस फिल्म में उनकी नायिका नूतन थी. यह फिल्म बहुत ही सफल रही. इसके बाद राजेन्द्र कुमार ने मुख्य किरदार के साथ ही चरित्र किरदार भी निभाने लगे.

       उन्होंने कुछ पंजाबी फिल्मों में भी काम किया, जिसमें 'तेरी मेरी एक जिंदगी' काफी लोकप्रिय फिल्म है. सन 1985 में राजेन्द्र कुमार ने बतौर निर्माता निर्देशक फिल्म 'लव स्टोरी' के साथ अपने बेटे कुमार गौरव को लॉन्च किया. यह फिल्म युवाओं में बहुत पसंद की गयी. राजेन्द्र कुमार और सुनील दत्त में काफी गहरी दोस्ती थी. इसी दोस्ती को निभाते हुए और अपने बेटे कुमार गौरव के कैरियर को संवारने के लिए उन्होंने सन 1987 में फिल्म 'नाम' का निर्माण किया. फिल्म बहुत ही सफल रही लेकिन इस फिल्म में संजय दत्त के कैरियर को फायदा मिला. राजेन्द्र कुमार के बारे में एक बार सुनील दत्त जी ने इंटरव्यू में कहा की आज तक राजेन्द्र कुमार को भले ही किसी फिल्म के लिए अवार्ड नहीं मिला है लेकिन वह एक मानवतावादी व्यक्ति हैं. उन दिनों जब संजय को गिरफ्तार किया गया था और प्रतिदिन हमारे घर की तलाशी होती थी. तब राजेन्द्र कुमार हमरे घर पर आकर रहते थे और इस बात की सांत्वना देते थे की यह सिर्फ जांच का हिस्सा है. उनको दुनिया की अच्छी समझदारी थी. अपने फिल्म व् स्टार्स के स्थ उदारता से पेश आते थे. अपने इसी विशेष दोस्ती को रिश्ते में बदलते हुए उन्होंने कुमार गौरव का विवाह सुनील दत्त की बेटी नम्रता के साथ किया.

     बतौर निर्माता एक बार फिर कुमार गौरव के लिए 1993 में फिल्म 'फूल' का निर्माण किया. यह फिल्म भी दर्शकों को रास नहीं आई.

     आखिरी बार दीपा मेहता की फिल्म 'अर्थ' (1998) में राजेंद्र कुमार नजर आए थे. राजेंद्र कुमार ने बहुत ही अनुशासित और आरोग्य दिनचर्या के लिए जाने जाते हैं. उनसे जुड़ें लोगों का कहना है की उन्होंने कभी भी जीवन में दवाइयां नहीं ली. भारतीय फिल्मों के इस सपूत का कैंसर की बीमारी के कारण 12 जुलाई 1999 में निधन हो गया.