Life and Journey of Superstar

एक अंतहीन निर्देशक श्याम बेनेगल
        shyam_benegal.jpgहिंदी फिल्म के इतिहास में कुछ फ़िल्में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हैं. ये फ़िल्में व्यावसायिक सफलता की मोहताज नहीं हैं. अंकुर, निशांत, मंथन और भूमिका ऐसी ही फ़िल्में हैं. इन फिल्मों ने भारतीय सिनेमा में एक नए आयाम को जन्म दिया. जिसे सामानांतर सिनेमा कहा जाने लगा और भारतीय फिल्म उद्योग में इस नए युग की शुरुआत करने वाले महान निर्देशक श्याम बेनेगल थे, जिन्होंने इन चरों फिल्मों का निर्देशन किया हैं. इन फिल्मों ने भारतीय सिनेमा को ऐसी रह दिखाई जो देशी और विदेशी दोनों वर्ग के फिल्म दर्शकों में एक अलग पहचान बने.


       14 दिसंबर 1934 को सिकंदराबाद (वर्तमान हैदराबाद) में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे बेनेगल ने सिर्फ 12 साल की उम्र में फिल्म बनाकर अपनी प्रतिभा का लोहा किशोर अवस्था में ही मनवा दिया, जब उन्होंने अपनी पहली फिल्म बनाई तो उनके फोटोग्राफर पिता श्रीधर बेनेगल उनके साथ हर कदम पर खड़े थे. 1959 में बतौर कॉपीराईटर के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले बेनेगल ने फिल्म निर्माण से पहले कई डाक्यूमेंट्री (लघु फ़िल्में) बने जिनमें 1962 में आई उनकी पहली डाक्यूमेंट्री फिल्म घेर बेठा गंगा (गंगेज इत डोरस्टेप्स ) की जो गुजराती भाषा में थी, खूब सराहा गया. फिर भी उन्होंने अपनी पहली फिल्म बनाने से पहले कई डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाई और 1966 - 1973 तक पुणे एफटीआईआई में छात्रों को फिल्म निर्माण के बारे में भी पढाया. 1973 में आई फिल्म अंकुर से उन्होंने शबाना आजमी को रुपहले पर्दे पर उतारा. 1975 में अंकुर फिल्म के लिए बेनेगल और शबाना आजमी दोनों को राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया. उन्होंने यह भी बताया कि फिल्म निर्माण से पहले जो तपस्या की उसका फल अंकुर के रूप में आया. 1976 में इन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया. अंकुर से जो अवार्ड का सिलसिला शुरू हुआ वह फिल्म दर फिल्म जरी रहा. इस बिच उन्होंने कई फ़िल्में निर्देशित की. इन फिल्मों को पसंद करने वालों का अलग ही वर्ग बना. 1982 में ओम पूरी, विक्टर बनर्जी जैसे कलाकारों से सजी फिल्म 'आरोहण' को बेस्ट फिल्म का नॅशनल अवार्ड भी मिला. ओम पूरी को भी इसी फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चुना गया. 1985 में आई फिल्म 'त्रिकाल' ने इनके कैरियर को नया मुकाम दिया. पास्ट, प्रेजेंट एंड फ्यूचर के गोवा के बैकड्रॉप पर सजी इस फिल्म के लिए श्याम बेनेगल को बेस्ट डायरेक्टर का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. इन्हें इतने अवार्ड मिले की यह अवार्ड्स मानो उनके सामने बौने हो गए. 1992 में धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध उपन्यास सूरज का सातवां घोडा पर इसी नाम से इन्होने फिल्म बने. राजित कपूर, राजेश्वरी सचदेव, पल्लवी जोशी, नीना गुप्ता और अमरीश पूरी जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म ने भी खूब नाम कमाया. इस फिल्म को देखने के बाद कुछ लोगों ने यह कहना शुरू किया कि श्याम बेनेगल सिर्फ अवार्ड की लिए फिल्म बनाते हैं. पर श्याम बेनेगल बिना इस पर कोई प्रतिक्रिया दिए हुए अपना कार्य बदस्तुरी जरी रखा. श्याम बेनेगल एक ऐसे निर्देशक रहे हैं जिन्होंने समाज की बुराईयों के बजाय ज्यादातर मानवीय संवेदनाओं को अपनी फिल्मों में स्थान दिया. 1983 में जब उन्होंने वयस्कों की कहानी पर मंडी फिल्म बनाई तो उन्होंने यह साबित कर दिया कि वे ऐसे बोल्ड विषय पर भी फिल्म बना सकते हैं. शबाना आजमी, स्मिता पाटील और कुलभुषण खरबंदा जैसे कलाकारों से अभिनीत यह फिल्म आज भी खूब पसंद की जाती हैं.



       1990 के दशक में जब फिल्मों पर आधुनिकता हावी हुई तो समानांतर सिनेमा के दर्शक कम होते गये. पर बेनेंगल रुके नहीं. इसी बीच उन्होंने मम्मो, सरदार बेगम जैसी अर्थपूर्ण फ़िल्में बनाई. परंतु 2001 में आई फिल्म जुबैदा से उन्होंने यह दिखने की कोशिश की कि वे इस नये युग में समानांतर सिनेमा बना सकते हैं. जिसमें कुछ व्यावसायिकता भी हो. इस फिल्म का संगीत ए आर रहमान ने दिया और रेखा, करिश्मा कपूर और मनोज वाजपेयी मुख्य भूमिका में थे. बतौर मनोज वाजपेयी उनके लिए सपने सच होने जैसा था. जब श्याम बेनेगल ने मुख्य भूमिका के लिए आमंत्रित किया, इससे पहले मनोज वाजपेयी संघर्ष के दिनों में बेनेगल के दफ्तर के खूब चक्कर लगा चुके थे. यह बात जब उन्होंने बेनेगल को बताई तो बड़ी सरलता से उन्होंने कहां कि उन्हें याद नहीं हैं कब वो आए थे. एक राजा की भूमिका को वाजपेयी की कलाकारी और बेनेगल के निर्देशन ने जिवंत कर दिया.


       2008 में आई फिल्म 'वेलकम टू सज्जनपुर' श्याम बेनेगल की दूसरी कॉमेडी फिल्म थी. इससे पहले 1975 में 'चरणदास चोर' बना चुके थे. 'वेलकम टू सज्जनपुर में उन्होंने सीधे सीधे लोगों के जीवन के माध्यम से हास्य को परोसा और उनके सुख दुःख को उसी रूप में दिखाया. एक डाकिया पत्र लिखने वाले की भूमिका में श्रेयस तलपडे खूब जमे और उन्होंने माना की बेनेगल के निर्देशन में काम करना उनके लिए भाग्य की बात हैं और शायद ही उन्हें दोबारा ऐसा रोल निभाने को मिले. आगे चलकर उन्होंने 'वेल्डन अब्बा' बनाई  जिसे भी लोगों ने खूब पसंद किया. इस फिल्म को अपने सामाजिक भ्रष्टाचार के विषय के लिए राष्ट्रिय अवार्ड दिया गया. श्याम बेनेगल आजकल और दो नयी फिल्मों का निर्देशन कर रहे हैं. उम्र के इस पड़ाव में कई उतार चढाव देख चुके बेनेगल के फिल्म निर्देशन का रुझान कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा हैं.

       फिल्मों के निर्माण और विकास के इए वह हमेशा प्रयासरत रहते हैं. इन दिनों वह मुंबई फिल्म महोस्तव के आयोजन में अहम् भूमिका निभा रहे हैं. तो बतौर निर्देशक टिपू सुल्तान की वंशज इनायत खान की बेटी नूर इनायत खान के जीवन पर आधारित फिल्म बना रहे हैं. जो व्दितीय विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश भारतीय जासूस थी.


         फिल्मों के इतर वह जीवन में बेहद ही साधारण और स्पष्ट व्यक्ति के तौर पर जाने जाते हैं. मुंबई में पत्नी निरा बेनेगल और बेटी प्रिय जो की एक फैशन डिजाइनर हैं के साथ अपनी सिनेमाई सोच को हमेशा नए आयाम देने के लिए कार्यरत रहते हैं.