Life and Journey of Superstar

पर्दे पर आम आदमी बासु चटर्जी
    basu chattejee.JPG              रजनीगंधा और चित्तचोर जैसी फिल्मों को प्रदर्शित तीन दशक से ज्यादा का समय हो गया हैं, पर उनकी ताजगी आज भी हमारे जहन में बनी हुई हैं. जैसे इन फिल्मों ने एक नया आयाम दिया. अपनी फिल्मों से इन्होने साबित किया की आम जनजीवन के परिदृश्य और आम जीवन में दिखने वाले साधारण पात्र भी रुपहले पर्दे पर अपनी छाप छोड़ सकते हैं. ऋषिकेश मुखर्जी की ही तरह बासु चटर्जी ने भी आम आदमी के जीवन को अपनी फिल्मों का विषय बनाया. उनकी फ़िल्में 1960 से 1990 के दशक में ताजा हवा के झोंको की तरह आई. जब हिंदी फिल्मों में हिंसा और अश्लीलता बढ़ती जा रही थी. चटर्जी की यह भी खासियत रही कि उन्होंने बड़े स्टारकास्ट की जगह अच्छी पटकथा पर ध्यान दिया और साफ़ सुथरी व मनोरंजक फ़िल्में बनाई. उस समय हिंदी सिनेमा में एंग्री यंगमैन का दौर चरम पर था और मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा, यश चोपड़ा जैसे दिग्गज फिल्मकारों का परचम लहरा रहा था, बासु चटर्जी ने फार्मूला से अलग हटते हुए आम आदमी को ध्यान में रखकर साफ़ सुधरी और मनोरंजक फ़िल्में बनाई जो न केवल बॉक्स ऑफिस पर कामयाब हुई बल्कि समीक्षक भी उसकी सराहना करने को मजबूर हो गए.


                     10 जनवरी 1930 राजस्थान के अजमेर में जन्मे बासु अपने आस पास के परिवेश और उनके रहन सहन से बेहद प्रभावित थे. उनकी फ़िल्में ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों की तरह ही थी. सारे पात्र और लोकेशन्स मध्य वर्गीय परिवार पर ही आधारित थे. चटर्जी ने अपने कैरियर की शुरुआत ब्लिट्स पत्रिका में राजनैतिक कार्टूनिस्ट के तौर पर की. फिल्म जगत में उनका आगमन फिल्म सोसायटी आंदोलन से हुआ. फिल्म सोसायटी आंदोंलन से अपने सात वर्षो के लंबे जुडाव के दौरान चटर्जी का संपर्क फ़्रांस, इटली, स्वीडन और जापान समेत विभिन्न देशों की फिल्मों से हुआ. इससे प्रेरित होकर 1969 में उन्होंने फिल्म 'सारा आकाश' के जारी पहली बार निर्देशन में हाथ आजमाए. इस फिल्म में भारतीय मध्यम वर्ग की दैनिक गतिविधियों को बड़े ही दिलचस्प तरीके से पर्दे पर पेश किया गया. फिल्म 'सारा आकाश' के लिए उन्हें उस वर्ष का बेस्ट स्क्रीन प्ले अवार्ड मिला. राजस्थान से मुंबई आए बासु को मुंबई में रहन सहन की तकलीफ ने इतना प्रभावित किया की उन्होंने इस पर फिल्म 'पिया का घर' बना दी. इस फिल्म में जोड़ी थी अनिल धवन और जया भादुड़ी ने इसमें मालती का ऐसा किरदार निभाया जिसमें वह शादी कर गांव से मुंबई शहर आती हैं और एक छोटी सी चाल में रहती हैं. इस पुरे फिल्म में बासु के निर्देशन में एक गहरी और असाधारण सी सोच दिखी.


                      1974 में आई फिल्म रजनीगंधा ने उन्हें एक बेहद सुलझे और उम्दा निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया. यह फिल्म मनु भंडारी के उपन्यास 'यह सच हैं'  पर आधारित थी. अमोल पालेकर, विद्या सिन्हा और दिनेश ठाकुर जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म में 1975 साल के लिए फिल्मफेयर में बेस्ट पिक्चर, पॉपुलर अवार्ड और क्रिटिक्स अवार्ड मिला. यह फिल्म अपने ज़माने के हिसाब से काफी अच्छी फिल्म थी. कहानी थी दीपा (विद्या सिन्हा) की जो अपने प्रेम को लेकर दुविधा में हैं की वह अपने वर्तमान संजय (अमोल पालेकर) को अपनाए या भूतकाल के प्रेमी नवीन (दिनेश ठाकुर) को. इस फिल्म में बासु ने एक निर्देशक के रूप में आम जनता से लेकर फिल्म समीक्षक सभी को अपना लोहा मनवाया.


                      एक निर्देशक के रूप में वो अपने आपको साबित कर चुके थे. पर 1976 में आई फिल्म 'चितचोर' ने उन्हें सफल निर्देशकों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया. रोमेन्स और संगीत से भरी फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर भी धमाल मचायी. बाद में इसी फिल्म का रीमेक मशहूर फिल्म निर्देशक सूरज बरजात्या ने 'मैं प्रेम की दीवानी हूं' बनायीं.
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                      'चितचोर' आधारित थी सुबोध घोष की कहानी पर. अमोल पालेकर और जरीना वहाब मुख्य भूमिका में थे और फिल्म में संगीत दिया था मशहूर संगीतकार रविन्द्रजैन ने. इस फिल्म का यशुदास द्वारा गाया हुआ गाना 'गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा' आज तक लोगों की जुबां पर हैं.


                       बासु ने अपने फ़िल्मी कैरियर में निर्देशक के रूप में 35 से अधिक फ़िल्में हिंदी और बांग्ला दोनों भाषाओं में बनाई जिसमें दिल्लगी, 'चितचोर', 'छोटी सी बात', 'खट्टा मीठा'प्रमुख रूप से गिनी जाती हैं. बासु चटर्जी को 1969 में सर्वश्रेष्ट पटकथा लेखक का फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया. इसके अलावा उन्हें 'रजनीगंधा' 1974, 'स्वामी'1977, और 'जीना यहां' 1979 के लिए फिल्म फेयर के बेस्ट क्रिटिक पुरस्कार से सम्मानित 
किया गया. चटर्जी कोचरती दुर्गा के लिए 1989 में राष्ट्रीय पुरस्कार 'जब की कमला की मौत' फिल्म के लिए एक बार फिर फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ट पटकथा लेखक का पुरस्कार दिया गया.


                        बड़े पर्दे के साथ ही बासु चटर्जी छोटे पर्दे पर भी अपनी एक अलग जगह बनायीं. जिन्होंने टेलीविजन पर सोप ओपेरा को लोकप्रिय बनाया. उन्होंने दूरदर्शन के लिए 'रजनी', 'दर्पण', 'कक्काजी' और 'ब्योमकेश बख्शी' जैसे धारावाहिकों का निर्माण किया. एक निर्देशक के रूप में बासु का सफ़र आज भी जारी है. साथ ही वे निर्माता के रूप में आज भी सक्रिय हैं. 'उतरन' (कलर्स टीवी) और 'दिल से दिया वचन' (जी टीवी) का निर्माण उन्होंने किया जो ये साबित करता है कि 82 साल के उम्र में भी रुपहला पर्दा छोटा या बड़ा नहीं होता हैं. बस उसमें एक जुनून होना चाहिए.