Life and Journey of Superstar

हिंदी अभिनेत्रियों की बदल दी पहचान नूतन
   inside_nutan_1352456973_640x640.jpg                  सावन का महिना..... पवन करे शोर.....सावन के महीने तो आते ही रहेंगे और जब भी पवन शोर करेंगे हमें एक महान अदाकारा की याद दिलाएंगे. जी हां, हम बात कर रहे हैं नूतन की. आप उन्हें नूतन समर्थ के नाम से जाने या नूतन बहल के नाम से, लोगों के दिलों में वो आज भी नूतन के रूप में ही जानी जाती हैं. उन्हें इस संसार से विदा लिए हुए करीब 13 सावन बीत चुके हैं. पर उनकी अदाकारी के पवन का शोर आज भी जारी है और रहेगा. भारतीय सिनेमा जगत में नूतन को एक ऐसी अभिनेत्री के तौर पर याद किया जाता हैं जिन्होंने फिल्मों में अभिनेत्रियों के महज शोपीस के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की परंपरागत विचार धारा को बदलकर उन्हें अलग पहचान दिलाई. 'सुजाता', 'बंदिनी', 'मैं तुलसी तेरे आंगन की', 'सीमा', 'सरस्वती चंद्र', और 'मिलन' जैसी कई फिल्मों में अपने उत्कृष्ट अभिनय से नूतन ने यह साबित कर दिया कि नायिकाओं में भी अभिनय क्षमता है और अपने अभिनय के आकर्षण के दम पर वे दर्शकों को सिनेमा हॉल तक लाने में सक्षम हैं. 4 जून 1936 को मुंबई के मराठी परिवार में जन्मी नूतन को फ़िल्मी जगत का माहौल बचपन में ही अपने घर से मिला था. शोभना समर्थ अभिनेत्री थी तो पिता निर्देशक और कवी थे. भले ही नूतन मधुबाला की तरह ग्लैमरस नहीं थी और ना ही नर्गिस की तरह संसुअल और ना ही मीना कुमारी की तरह करिजमेटिक थी. पर 70 से अधिक हिंदी फिल्मों में अभिनय कर यह साबित भी कर दिया कि वे अगर इन अभिनेत्रियों से 21 नहीं तो बीस भी नहीं थी. साथ ही उनमें एक सिंप्लिसिटी सी थी जो लोगों को भीतर तक छू जाती थी साथ ही वो हर किस्म के रोल में अपने आपको सहज पाती थी. नूतन के परिवार में माता- पिता के अतिरिक्त कुल 3 बहने और एक भाई थे. मशहूर अदाकारा तनूजा नूतन की बहन है और काजोल नूतन की भांजी हैं.


                    नूतन का फ़िल्मी सफ़र स्कूल के दिनों में ही शुरू हो गया था. नूतन ने बतौर बाल कलाकार फिल्म 'नल दमयंती' से अपने सिने कैरियर की शुरुआत की. इसी बीच नूतन ने अखिल भारतीय सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लिया जिसें वह प्रथम चुनी गयी. लेकिन फिर भी बॉलीवुड के किसी निर्माता का ध्यान उनकी और नहीं गया. बाद में मां और उनके मित्र मोतीलाल की सिफारिश की वजह से नूतन को वर्ष 1950 में प्रदर्शित फिल्म 'हमारी बेटी' में अभिनय करने का मौका मिला. इस फिल्म का निर्देशन उनकी मां ने किया. हालांकि यह फिल्म तो नहीं चली पर लोगों ने नूतन के काम को खूब सराहा. इसके बाद नूतन ने 'हमलोग', शीशम', 'नगीना' और 'शवाब' जैसी फिल्मों में अभिनय किया लेकिन इस फिल्मों से वह कुछ खास पहचान नहीं बना सकी.


                     वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म 'सीमा' से नूतन ने विद्रोहिणी नायिका के सशक्त किरदार को रुपहले पर्दे पर साकार किया. इस फिल्म में नूतन ने सुधार गृह में बंद कैदी की भूमिका निभायी जो चोरी के झूठे इल्जाम में जेल में अपने दिन काट रही थी. नूतन ने अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों में अपनी कभी न मिटने वाली पहचान बनायीं इसके साथ ही फिल्म में अपने दमदार अभिनय के लिए नूतन को अपने सिने कैरियर का सर्वश्रेष्ट फिल्म अभिनेत्री का पुरस्कार भी मिला. इस बीच नूतन ने देव आनंद के साथ 'पेइंग गेस्ट' और 'तेरे घर के सामने' में हल्के- फुल्के रोल कर अपनी बहुआयामी प्रतिभा का परिचय दिया. वर्ष 1958 में प्रदर्शित फिल्म 'सोने की चिड़िया' के हिट होने के बाद फिल्म इंडस्ट्री में नूतन के नाम के डंके बजने लगे और बाद में एक के बाद एक कठिन भूमिकाओं को निभाकर वह फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गई.


                      वर्ष 1958 में प्रदर्शित फिल्म 'दिल्ली का ठग' में नूतन ने स्विमिंग कॉस्ट्युम पहनकर उस समय के समाज को चौका दिया. फिल्म 'बारिश' में नूतन काफी बोल्ड दृश्य दिए, जिसके लिए उनकी काफी आलोचना भी हुई लेकिन बाद में विमल राय की फिल्म 'सुजाता' एवं 'बंदिनी' में नूतन ने अत्यंत मर्मस्पर्शी अभिनय कर अपनी बोल्ड अभिनेत्री की छवि को बदल दिया. वर्ष 1959 में प्रदर्शित फिल्म 'सुजाता' नूतन के सिने कैरियर के लिए मील का पत्थर साबित हुई. फिल्म में नूतन ने अछूत कन्या के किरदार को रुपहले पर्दे पर साकार किया. इसके साथ ही फिल्म में अपने दमदार अभिनय के लिए वह अपने कैरियर में दूसरी बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित की गई. वर्ष 1963 में प्रदर्शित फिल्म 'बंदिनी' भारतीय सिनेमा जगत में अपनी संपूर्णता के लिए सदा याद रखी जाएगी. फिल्म में नूतन के अभिनय को देखकर ऐसा लगा कि केवल उनका चेहरा ही नहीं बल्कि हाथ और पैर की उंगलियां भी अभिनय कर सकती हैं. इस फिल्म में अपने जीवंत अभिनय के लिए नूतन को एक बार फिर से सर्वश्रेष्ट अभिनेत्री का फिल्म फेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुआ. इस फिल्म से जुड़ा एक रोचक पहलू यह भी है कि फिल्म के निर्माण के पहले फिल्म अभिनेता अशोक कुमार की निर्माता विमल रॉय से अनबन हो गई थी और वह किसी भी कीमत पर उनके साथ काम नहीं करना चाहते थे लेकिन वह नूतन ही थी जो हर कीमत पर अशोक कुमार को अपना नायक बनाना चाहती थी.नूतन के जोर देने पर अशोक कुमार ने फिल्म 'बंदिनी' में काम करना स्वीकार किया था. 1959 में उन्होंने कमांडर रजनीश बहल से शादी कर ली. इसी साल उनकी प्रदर्शित फिल्म 'सुजाता' के लिए सर्वश्रेष्ट अभिनेत्री का अवार्ड जीता और फिर परिवार की जिम्मेदारियों के चलते फ़िल्मी दुनिया से कुछ समय के लिए विराम ले लिया. इस बीच वो मोहनिस बहल को जन्म दे चुकी थी और एक सफल गृहिणी बन चुकी थी पर जैसे ही मशहूर फिल्म निर्देशक बिमल रॉय 'बंदिनी' का ऑफर लेकर आए तो उन्हें अपना सन्यास त्यागना पड़ा. इस फिल्म ने सफलता के नए कीर्तिमान तय किये. अशोक कुमार और धर्मेन्द्र के साथ उनकी जोड़ी आज भी याद की जाती हैं. इस फिल्म का एक गाना 'ओ रे माजी.....मेरे साजन है उस पार' अक्सर सुनने को मिल जाता हैं. यह फिल्म नूतन के कैरियर की एक बेहतरीन फिल्म साबित हुई और इस फिल्म के लिए बेस्ट एक्ट्रेस से नवाजा गया.


                        1960 से 1970 के बिच नूतन ने एक से एक फ़िल्में दी जिनमें से प्रमुख हैं 'मिलन' (1967), 'सरस्वती चंद्र' (1968), 'सौदागर' (1973), और 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' (1978). इस फिल्म के लिए नूतन को उस वर्ष का बेस्ट एक्ट्रेस अवार्ड भी मिला. एक सौतेली स्त्री के किरदार को उन्होंने बखूबी जिया. इस फिल्म के गीत 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' से नूतन की साफ सुधरी छवि बनी और उस ज़माने के सारे काबिल निर्देशक नूतन के साथ काम करना चाहते थे. जिनमें बिमल रॉय, मनमोहन देसाई, राज खोसला और बसु भट्टाचार्य खास तौर से गिने जाते थे.

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                          अस्सी के दशक में नूतन ने चरित्र भूमिकाएं निभानी शुरू कर दी और कई फिल्मों में मां के किरदार को रुपहले पर्दे पर साकार किया. 1985 में सुभाष घई के निर्देशन में बनी फिल्म 'मेरी जंग' ने उन्हें मां  की भूमिका में अलग पहचान दी. आगे चलकर उन्होंने 'कर्मा' और 'नाम' में भी अपनी अमित छाप छोड़ी. साथ ही उन्होंने दूरदर्शन के लोकप्रिय धारावाहिक 'मुजरिम हाजिर हो' में भी सशक्त भूमिका निभाई.


                            नूतन ने 50 से अधिक फिल्मों में काम किया और उन्हें बहुत से अन्य पुरस्करों के अलावा 6 बार फिल्मफेयर पुरस्कार मिले. (जो कि अभी तक किसी भी दूसरी अभिनेत्री से अधिक हैं). 1994 में आई फिल्म 'इंसानियत' उनकी आखरी फिल्म थी. पर 1991 में इस फिल्म के आने स्व पहले ही वो कैंसर  से लड़ते हुए जिंदगी की जंग हार गयी. नूतन एक ऐसे दौर में जन्मी थी जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था. पर उनमें आधुनिकता शुरू से ही हावी थी. भले ही अब वो हमारे बीच नहीं है पर अपनी फिल्मों से वो सदा हमारे बीच बनी रहेगी.