Life and Journey of Superstar

सिनेमा की दयालु माँ - निरूपा रॉय
AanMiloSajna2-00428.jpg                      पर्दे पर उन्होंने भारतीय सिनेमा की सबसे सशक्त मां के रूप में जानी जाती हैं. तीन दशक तक चरित्र रोल में उन्होंने जो छाप छोड़ी हैं वो आज तक हमें याद हैं. और आने वाली पीढ़ी को भी याद रहेगी. जी हां, हम बात कर रहे हैं निरूपा रॉय की....'मेरे पास माँ हैं' जैसे संवाद ऐसे ही हिंदी सिनेमा के सबसे हिट डायलोग नहीं बने हैं. हिंदी सिनेमा में जब भी माँ के किरदार को सशक्त करने की बात आती है तो सबसे पहला नाम निरूपा रॉय का जन्म 4 जनवरी 1931 वलसाड, गुजरात में हुआ था. गौरवर्णी होने के कारण गांव में उन्हें 'गोरी चकली' कहकर पुकारते थे. उनके पिता रेलवे में काम किया करते थे. निरूपा रॉय ने चौथी तक शिक्षा प्राप्त की. सिर्फ 15 साल की उम्र में उनकी शादी कमाल रॉय से हो गयी और वो अपने पति के साथ मुंबई आ गयी. मशहूर अभिनेत्री श्यामा से उनकी करीबी दोस्ती थी. जिनकी वजह से उन्हें फ़िल्मी दुनिया में कदम बढ़ाने में बहुत मदद मिली. उन्हीं दिनों निर्माता- निर्देशक बी एम व्यास अपनी नई फिल्म 'रानकदेवी' के लिए नए चेहरों की तलाश कर रहे थे. उन्होंने अपनी फिल्म कलाकारों की आवश्यकता के लिए अख़बार में विज्ञापन निकाला. निरूपा रॉय के पति फिल्मों के बेहद शौकीन थे और अभिनेता बनना चाहते थे. कमाल रॉय अपनी पत्नी को लेकर बी एम व्यास से मिलने गए और अभिनेता बनने की पेशकश की. लेकिन बी एम् व्यास ने साफ़ कह दिया कि उनका व्यक्तित्व अभिनेता के लायक नहीं. लेकिन यदि वह चाहे तो उनकी पत्नी को फिल्म में अभिनेत्री के रूप में काम मिल सकता हैं. फिल्म 'रनकदेवी' में निरूपा रॉय 150 रु. माह पर काम करने लगी.



निरूपा रॉय ने अपने सिने कैरियर की शुरुआत 1946 में प्रदर्शित गुजराती फिल्म 'गणसुंदरी' से की. वर्ष 1949 में प्रदर्शित फिल्म 'हमारी मंजिल' से उन्होंने हिंदी फिल्म की और भी रुख कर लिया. ओ पी दत्ता के निर्देशन में बनी इस फिल्म में उनके नायक की भूमिका प्रेम अदीन ने निभाई. उसी वर्ष उन्होंने जयराज के साथ फिल्म 'गरीबी' में काम करने का अवसर मिला. इन फिल्मों की सफलता के बाद वह अभिनेत्री के रूप में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गई. वर्ष 1951 में निरूपा रॉय की एक और महत्वपूर्ण फिल्म 'हर हर महादेव' प्रदर्शित हुई. इस फिल्म में उन्होंने देवी पार्वती की भूमिका निभाई. फिल्म की सफलता के बाद वह दर्शकों के बीच देवी के रूप में प्रसिद्ध हो गई. इसी दौरान उन्होंने फिल्म 'वीर भीमसेन' में द्रोपदी का किरदार निभाकर दर्शकों का दिल जीत लिया. पचास और साठ के दशक में निरूपा रॉय ने जिन फिल्मों में काम किया उनमें अधिकतर फिल्मों की कहानी धार्मिक और भक्तिभावना से परिपूर्ण थी. हालांकि वर्ष 1951 में प्रदर्शित फिल्म 'सदबाद द सेलर' में निरूपा रॉय ने नकारात्मक चरित्र भी निभाया. वर्ष 1953 में प्रदर्शित फिल्म 'दो बीघा जमीन' निरूपा रॉय के सिने कैरियर के लिए मील का पत्थर साबित हुई. विमल रॉय के निर्देशन में बनी इस फिल्म में यह एक किसान की पत्नी की भूमिका में दिखाई दी. फिल्म में बलराज साहनी ने मुख्य भूमिका निभाई थी. बेहतरीन अभिनय से सजी इस फिल्म में दमदार अभिनय के लिए उन्हें अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई.


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हालांकि 1940 और 1970 के दशक में उन्होंने कई धार्मिक फ़िल्में की जिसकी वजह से लोग उन्हें सम्मान की दृष्टी से देखते थे. फ़िल्मी पर्दे पर देवी मां का किरदार से जोड़कर देखते थे. यही से उनकी एक विशेष छवि बनी. पर 1953 में आई 'दो बीघा जमीन' इस अदाकारा ने अपने अभिनय से चार चाँद लगा दिये. 1956 में आई फिल्म 'मुनीमजी' के लिए निरूपा रॉय को मल्टी किरदार को निभाने के लिए उस साल के सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्म फेयर अवार्ड मिला. 1961 में आई फिल्म 'धर्मपुत्र' यश चोपड़ा के निर्देशन में बनने वाली दूसरी फिल्म थी जो की मशहूर उपन्यासकार शराइना चतुरसेन के उपन्यास धर्मपुत्र पर ही आधारित थी. इस फिल्म में वो पहली बार शशि कपूर की मां बनी और वो यश चोपड़ा के पसंदीदा मां के रोल में शामिल हो गई. आगे चलकर उन्होंने फिल्म 'शहीद' 1956 में दुर्गा भाभी का किरदार निभाया. यश चोप्रा निर्देशित फिल्म 'दीवार' (1975) में सुमित्रा देवी के रोल ने उन्हें जीवंत बना दिया. इस फिल्म में वो शशि कपूर और अमिताभ बच्चन दोनों की माँ बनी. इस फिल्म में उन्होंने माँ का ऐसा किरदार निभाया जो हिंदी फिल्म की सबसे सशक्त माँ के रूप में याद रखा जाता हैं. उनकी भूमिका अत्यंत प्रभावशाली रही हैं. उन्होंने सर्वप्रथम फिल्म 'दीवार' में अमिताभ बच्चन की माँ के रूप में 'सिकंदर', 'अमर अकबर एंथोनी', 'सुहाग', 'इंकलाब', 'गिरफ्तार', 'मर्द', और 'गंगा जमुना सरस्वती' जैसी फिल्मों में भी वह अमिताभ बच्चन की ही माँ की भूमिका में दिखाई दी. निरूपा रॉय ने अपने पांच दशक लंबे सिने कैरियर में लगभग 300 फिल्मों में अभिनय किया. उनकी कैरियर की उल्लेखनीय फिल्मों में कुछ हैं, 'सती सुकन्या', 'श्री विष्णु भगवान', 'इज्जत', 'भक्त पुराण', 'नौकरी', 'औलाद', 'गरम काट', 'भाई- भाई', 'कंगन', 'बेजुबान', 'गुमराह', 'गृहस्थी', 'संतान', 'मुसाफिर', 'फूलों की सेज', 'मुझे जीने दो', 'जिंदगी', 'शहनाई', 'शहीद', 'राम और श्याम', 'घर घर की कहानी', 'पूरब और पश्चिम', 'गोपी', 'अभिनेत्री', 'कच्चे धागे', 'रोटी', 'माँ', 'क्रांति', 'तेरी कसम', 'बेताब', 'मवाली', 'सोने पे सुहागा', 'औरत तेरी यही कहानी', 'प्यार का देवता' आदि. आगे चलकर वो सदी के महान अभिनेता अमिताभ बच्चन की माँ के लिए सर्वश्रेष्ठ आंकी गयी, जिनमें 'अमर अकबर एंथोनी', 'सुहाग', 'मर्द', 'लाल बादशाह' में उन्होंने अंतिम बार अमिताभ बच्चन की माँ का किरदार निभाया. 2003 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाजा गया. 



13 अक्टूबर 2004 को 72 साल की उम्र में लंबी बिमारी के चलते दिल का दौरा पड़ने के बाद निधन हो गया पर आज भी वो हमारे बीच अपनी अदाकारी से सिनेमा की माँ बनकर हमारे बीच मौजूद हैं.