Life and Journey of Superstar

बोल्ड और ब्यूटीफुल "जीनत अमान"
IMG-0003-jpg_091559.jpg                   आज फिल्मी दुनिया मे अभिनेत्रियो के लिए सेक्स सिंबल का ख़िताब लोकप्रियता और गर्व है. लेकिन 70 के दशक मे यह आत्मघाती कदम था यह काम केवल हेलन जैसी अभिनेत्रियों को यह आज़ादी थी. पर 70 के दशक मे बॉलीवुड मे एक ऐसी अभिनेत्री ने कदम रखा जिसने 'सत्यम शिवम सुंदरम' गाते हुए भी अपनी सेक्सी छवि से लोगो को सोचने पर मजबूर कर दिया की क्या अब बॉलीवुड की अभिनेत्रियों की यही नयी परिभाषा है.


जी हम बात कर रहे है 19 नवम्बर 1951 को मुंबई मे जन्मी ज़ीनत अमान की जिनका जन्म एक मुस्लिम परिवार मे हुआ. पिता अमानुल्लाह ख़ान मुस्लिम हिंदू मदर ससींड़ा के घर जन्मी ज़ीनत अमन को आधुनिकता बचपन से देखने को मिली. सयद तभी उनके जीवन मे अब तक आधुनिकता शामिल है. फिल्म राइटर के घर मे जन्मी ज़ीनत अमन को फिल्म की परिभाषा बचपन से देखने को मिली आख़िर उनके बचपन के दौर मे ही उनके घर के आंगन मे मुग़ल-ए-आज़म और पाकीजा जैसी सरीखी फ़िल्मे लिखी पिता दोनो फ़िल्मे के स्क्रिप्ट राइटर थे. ज़ीनत सिर्फ़ 13 साल की उम्र मे अपने पिता को खो दिया और मां ने एक जर्मन नागरिक हाइन्ज़ से शादी कर मिस. हाइन्ज़ बन गयी ज़ीनत को अपने नये जर्मन पिता के देश जर्मनी जाना पड़ा वहा ज़ीनत का मन कभी नही लगा और 18 की होते ही वो अपने प्यारे देश भारत लौट आई. भले ही ज़ीनत की मां ने अपना नाम बदल लिया परंतु ज़ीनत ज़ीनत अमान ही रही इससे उनकी बोल्डनेस  का एक उदाहरण मिलता है. भारत आने के बाद अमान ने अपनी पढ़ाई स्ट्रीट. आइयेवियरस कॉलेज, मुंबई मे की और फिर आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चली गयी.  और वापस आने के बाद फेमिना मैगज़ीन मे एक पत्रकार के रूप मे अपना करियर शुरू किया परंतु जल्द ही उनका रुझान माडलिंग की तरफ हुआ और उन्होने इसके लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया. आधुनिक परिवार मे जन्मी ज़ीनत सुरू से ही बॉलीवुड की तरफ अपना कदम बढ़ाना चाहती थी. तबी उन्होने मिस इंडिया और मिस एशिया पेसिफिक जैसी सौंदर्य प्रतियोगिता मे हिस्सा लिया. जीनत मिस इंडिया कॉंटेस्ट सेकेंड रन्नर उप भी रही और 1970 मे मिस एशिया पेसिफिक चुनी गयी.इसके बाद उन्होने पीछे मूड कर नही देखा. वो ताज महल टी और टेलीविजन के लिए मॉडलिंग करती रही. मिस एशिया पॅजंट जीतने के बाद उनके मॉडलिंग कैरियर को मानो चार चाँद लग गये उन्हे मॉडलिंग के कई बड़े ऑफर आने लगे.


1971 का साल ज़ीनत के लिए काफ़ी उतार चढ़वा वाला रहा. इस साल ज़ीनत को अपना पहला फिल्मी ब्रेक मिला. फिल्म 'हलचल' मे उन्हे एक छोटा सा रोल मिला और साथ ही फिल्म 'हंगामा' मे उन्हे एक और छोटा किंतु अच्छा रोल मिला. इस फिल्म के नायक थे सिंगर किशोर कुमार पर यह दोनो फ़िल्मे ही बॉक्स ऑफीस पर कोई कमाल नही दिखा सकी और उन्होने अपनी मां के पास जर्मनी जाने का फैसला किया.


उसी साल देव आनंद साहब की नज़र ज़ीनत पर पड़ी और उन्होने ने उन्हे फिल्म 'प्रेम पुजारी' मे ज़हीदा का रोल ऑफर किया जो इस फिल्म मे दूसरी अभिनेत्री का था. पर इस रोल को मुमताज़ खुद निभाना चाहती थी सो ज़ीनत की किस्मत एक बार फिर दगा दे गयी. और वी इस फिल्म से आउट हो गयी लेकिन देव साहब ने ज़ीनत को निराश नही किया. देव साहब ने ज़ीनत को अपनी फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' मे बहन का रोल ऑफर किया जिसे उन्होने तुरंत स्वीकार लिया. फिल्म मे ज़ीनत का किरदार जसबीर का था जो माता-पिता की उपेक्षा के बाद नशे की लत मे फंसी लड़की का किरदार ज़ीनत ने बखूबी निभाया. मुमताज़ और देव आनंद जैसे सरीखे कलाकारो के साथ नवोदित ज़ीनत ने अपनी अभिनय की अमित छाप छोड़ी. आशा भोसले द्वारा गाए गीत 'दम मारो दम' को हुक्के के दम भरते हुए ज़ीनत ने मानो जान डाल दी. देव आनंद के निर्देशन और आर. ड़ी. बरमन के संगीत से सजी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफीस मे ऐसा धमाल मचाया की ज़ीनत बहन के किरदार मे हिरोइन बन कर उभरी. ज़ीनत को आज तक 'दम मारो दम' के लिए आज भी याद किया जाता है. यह फिल्म ज़ीनत के लिए ना सिर्फ़ सफलता लेकर आयी बल्कि 1972 के लिए उन्हे फ़िल्म्फेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस अवॉर्ड भी मिला. देव-ज़ीनत की जोड़ी ने आगे भी करीब दर्ज़ेन भर फ़िल्मो मे साथ काम किया. जिनमे 'हीरा पन्ना' (1973), 'इश्क़ इश्क़ इश्क़' (1974), 'प्रेम शस्त्र' (1974), 'वॉरेंट' (1975), 'डार्लिंग डार्लिंग' (1977) 'आंड कालाबाज़' (1977) शामिल है. वॉरेंट ने बॉक्स-ऑफीस बिग्गेस्ट सक्सेस पाई. इस फिल्म के निर्देशक थे प्रमोद चक्रवर्ती और ज़ीनत के साथ थे देव आनंद, ज़ीनत अमन, प्राण, दारा सिंग, अजीत, ललिता पवार जैसे कलाकार. इस फिल्म मे संगीत था आर. द. बर्मन का फिल्म के गाने खूब लोकप्रिय हुए.


1973 मे आई फिल्म यादों की बारात मे आशा भोंसले द्वारा गाए गीत "चुरालिया है तुमने जो दिल को" मे हाथ मे गिटार लिए हुए ज़ीनत ने युवाओं की धड़कने तेज़ कर दी. यह स्टाइल आज भी युवाओं में आइकॉन माना जाता है. अपनी वेस्टर्न हिरोइन लुक मे ज़ीनत ने हिंदी फिल्म मे अपनी एक अलग छाप छोड़ी.वह युवो की पहली पसंद बन गयी थी. शायद यही कारण था की 70 से 74 के बीच वो हर फिल्मी मैगज़ीन मे छाई हुई थी. सिने ब्लिट्ज़ मैगज़ीन ने उन्हे अपने कवर पर जगह दी. आगे चल कर फिल्मी मैगज़ीन की वो कवर गर्ल बनी. यह बात उनकी उस दौर मे लोकप्रियता का अंदाज़ा लगाने के लिए काफ़ी थी. आगे फेमस मैगज़ीन 'स्टारडस्ट' ने भी उन्हें अपनी कवर गर्ल बनाया. ज़ीनत ने उस दौर के सभी उम्दा निर्माता निर्देशको के साथ काम किया. जिनमे देव आनंद, बी. आर. चोप्रा, राज कपूर, मनमोहन देसाई, फिरोज़ ख़ान, नसीर हूसेन, मनोज कुमार, प्रकाश मेहरा, राज खोसला और शक्ति सामंत प्रमुख रूप से शामिल है.


अपने फिल्मी कैरियर मे ज़ीनत ने एक से एक फ़िल्मे की पर 1978 मे आई फिल्म राज कपूर निर्देशित फिल्म 'सत्यम शिवम सुंदरम' ने ज़ीनत को वो मुकाम दिया जिसकी वो सही मायने मे हक़दार थी. एक चेहरे से जली हुई लड़की जो हर वक़्त अर्धनग्न रहती थी इसकी काफ़ी आलोचना हुई. राज कपूर ने इस फिल्म मे ज़ीनत की सेक्स अपील को जम कर भुनाया. फिल्म मिस्टर ज़ीनत ने अंगप्रर्दशन भी खूब किया परंतु नायक शशि केपर द्वारा जली लड़की के ठुकारए जाने के दर्द को उन्होने ने बखूबी जिया. फिल्म के गाने आज भी लोकप्रिय है. आलोचना के बावजूद इस फिल्म को दर्शको ने खूब सराहा और ज़ीनत को फिल्म 'सत्यम शिवम सुंदरम' फिल्म फेयर का बेस्ट आक्ट्रेस का अवॉर्ड मिला.
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 बी. आर. चॉप्रा की 'इंसाफ़ का तराज़ू' (1980) मे उन्होने बलात्कार की शिकार ऐसी लड़की की भूमिका की जो की आधुनिक होने के कारण लोगो की आलोचना झेलती है. अपने ज़माने के हिसाब से यह फिल्म काफ़ी बोल्ड थी. परंतु कठघरे मे खड़े हो कर जज के सामने उन्होने यादगार सीन लोगो की जुबां पर आज भी ताज़ा है. इस फिल्म से उन्होने यह साबित किया की 'सत्यम शिवम सुंदरम' मे उनके द्वारा किया गया अभिनय को वो आगे बढ़ा रही है.ज़ीनत के पास अच्छी फ़िल्मो की कभी कमी नही रही उस दौर के कई अच्छे अभिनेता के साथ उनकी जोड़ी खूब सराही गयी. 'डॉन' मे वो बिग बी के साथ नज़र आई. इस फिल्म का गाना “खइके के पान बनारस वाला ” आज तक लोगो के ज़ुबान पर है. कहा जाता है की वे दिल की काफ़ी अच्छी थी. इसकी ताज़ा मिसाल तब देखने को मिली जब डॉन के प्रोड्यूसर नरीमन ईरानी की फिल्म की शूटिंग के दौरान ही मौत हो गयी तब उन्होने एक भी पैसा लिए बिना इस फिल्म की शूटिंग पूरी की. इस फिल्म ने भी बॉक्स ऑफीस पर खूब धमाल मचाया. अपने दौर के कई हिरोइन परवीन बाबी और टीना मुनीम की लिस्ट मे उनका नाम सबसे पहला था. ज़ीनत की एक्टिंग का सुनहरा दौर था जिसमे आगे चल कर 'धरम वीर', 'छैला बाबु' और फिल्म 'अलीबाबा और 40 चोर' मे मुख्य किरदार निभाने के बाद उनकी चर्चा रशिया मे हुई. इस फिल्म को वहा बेहद सफलता प्राप्त हुई. 1980 के दशक मे उन्होने कई यादगार फ़िल्मे की पर उनका कैरियर अब ढलान पर था, 1985 मे मशूहर पाकिस्तानी क्रिकेटर मज़हर ख़ान से शादी कर ली और कम फ़िल्मे करने लगी. 1989 मे आई फिल्म 'गवाही' मे अंतिम बार वो मुख्य भूमिका मे नज़र आई.उनका वैवाहिक जीवन विवादो मे रहा. उन्होने अपने पति मज़हर ख़ान पर मार पीट का आरोप भी लगाया. 1998 मे मज़हर ख़ान की मौत के बाद वो अपने दो बेटे अज़ान और ज़हां के साथ हमेशा के लिए मुंबई आ गयी.


रुपहले पर्दे पर वापसी के बाद भी उन्होने कई फिल्म मे यादगार भूमिका की. जिनमे 'भोपाल एक्सप्रेस', 'बूम' (2003), 'जाना... लेट'स फॉल इन लव' (2006), 'चौराहें' (2007), 'अगली और पगली' (2008), 'गीता इन पॅरडाइस' (2009),  दो दुने चार... ना जाने क्यों (2010) शामिल है. पर एक बोल्ड अभिनेत्री का वह सुनहरा दौर अब बीत चुका है. उन्होंने  कई हिंदी और अंग्रेजी प्ले मे भी काम किया. अब वो सिल्वर स्क्रीन पर कम ही नज़र आती है. पर फिल्मी अवॉर्ड या पार्टियों मे जाने पर इस उम्र मे लोगो की नज़र ज़ीनत पर पड़ती है तो बिना एक तक देखे नही रह सकते. वो खूबसूरत है बोल्ड है और उनका जादू आज भी लोगो पर कायम है. साथ ही जीवन मे हमेशा वो आगे बढ़ने का हौसला रखती है जिसमे गम की छाया भी न हो.