Life and Journey of Superstar

पर्दे का रोमांटिक नायक - विनोद मेहरा
 557.jpg                              हिंदी फिल्मों में चॉकलेटी हीरो की माँग सदा बनी रहे ऐसे ही अभिनेताओं में एक नाम विनोद मेहरा भी हैं, जो दशकों तक भारतीय सिनेमा के दर्शकों को अपने अभिनय से लुभाते रहे. एक बोल्ड कलाकार से अपना कैरियर शुरू करने वाले विनोद मेहरा को सही पहचान 70 के दशक में ही मिली. 13 फ़रवरी 1945 को लाहौर में जन्मे विनोद मेहरा फिल्म 'रागिनी' से अपने कैरियर का आगाज किया. फिल्म रागिनी में किशोर कुमार के बचपन का रोल उन्होंने निभाया था. आई. एस. जौहर की फिल्म 'बेवकूफ' (1960) और विजय भट्ट की फिल्म 'अंगुलिमाल' (1960) में छोटे- मोटे रोल में भी विनोद दिखाई दिया देते थे. मुंबई के चर्चगेट इलाके में गेलार्ड नामक एक रेस्टोरंट में पचास- साठ के दशक में संघर्ष कर रहे फ़िल्मी कलाकारों का अड्डा हुआ करता था. वहां 'रूप के शोरी' नामक फिल्म डायरेक्टर अक्सर आया- जाया करता था. उनकि निगाह विनोद मेहरा पर ऐसी जमी कि उन्होंने अपनी फिल्म में सीधे नायक की भूमिका सौंप दी.


 चॉकलेटी- दौर के नायकों में एक सुदर्शन चेहरा लेकर 1971 में फिल्म 'एक थी रीटा' में विनोद मेहरा अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे. फिल्म में तनूजा उनकी नायिका थी. विनोद मेहरा के फिल्म कैरियर के मौसम को खुशनुमा बनाने में अभिनेत्री मौसमी चटर्जी का जबरदस्त हाथ हैं. शक्ति सामंत की फिल्म अनुराग (1972) में मौसमी- विनोद पहली बार साथ आए. मौसमी ने एक दृष्टिहीन युवती का रोल संजीदगी के साथ किया था. विनोद एक आदर्शवादी नायक थे और अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध वह मौसमी से शादी करना चाहते थे.


इसके बाद फिल्म 'उस पार' (बसु चटर्जी), 'दो झूठ' (जीतू ठाकुर) तथा 'स्वर्ग नरक' में मौसमी चटर्जी के नायक बने. विनोद को स्वतंत्र रूप से नायक बनने और हिरोइन से रोमांस लड़ाने अथवा पेड़ों के इर्दगिर्द गाना गाने के अवसर ए ग्रेड के बजाय बी ग्रेड फिल्मों में ज्यादा मिले क्योंकि बड़े निर्देशकों की फिल्मों में उन्हें ज्यादातर दूसरी लीड का नायक माना गया.


उस वक्त मल्टीस्टारर फिल्मों का दौर था. विनोद खन्ना, राजेश खन्ना, संजीव कुमार, धर्मेन्द्र, जितेंद्र या अमिताभ के रहते हुए विनोद मेहरा को फिल्मों में ज्यादा अवसर नहीं मिलते थे. विनोद मेहरा के कैरियर की यह ट्रेजेडी मानी जाएगी कि उन्हें बड़े बैनर्स से ज्यादा ऑफर नहीं आए. बी.आर. चोपड़ा की फिल्म 'द बर्निग ट्रेन' में वे सवार थे. लेकिन इस फिल्म में ट्रेन के मुसाफिरों की भीड़ के समान कलाकार थे. इसके बावजूद बर्निंग ट्रेन बॉक्स ऑफिस पर भी बुरी तरह जल गई थी. कोई सफल सितारा अपने इंटरव्यू में बर्निंग ट्रेन का जिक्र तक नहीं करना चाहता था. लिहाजा इस फिल्म में विनोद मेहरा का होना नहीं जैसा था.


हिंदी फिल्मों के साथ विनोद ने दक्षिण भारतीय फ़िल्मी की तरफ भी अपने अभिनय के कदम बढाए और वहा भी जल्द जी लोगो के पसंदीदा कलाकार बन गये लेकिन दक्षिण भारतीय फिल्मकारों की पसंद बनने से अभिनेता का सबसे बड़ा नुकसान यह होता हैं कि उसके पैर तले से बॉलीवुड की जमीन खिसक जाती हैं. अस्सी के दशक में विनोद मेहरा को वैरायटी की फ़िल्में और वैरायटी भरे रोल मिले, लेकिन इन फिल्मों में जो मुख्य नायक- नायिका थे, साडी लोकप्रियता बटोर कर ले गए. मोहन सहगल निर्देशित फिल्म कर्तव्य की सफलता धर्मेन्द्र और रेखा के खाते में लिखी गई.


'बेमिसाल' (ऋषिकेश मुखर्जी) और 'खुद्दार' (रवि टंडन) की कामयाबी का लाभ अमिताभ की मिला. 'लाल पत्थर' में राजकुमार- हेमा मालिनी का स्क्रीन प्रजेंस विनोद पर भारी पड़ा. शोले के गब्बर सिंह उर्फ़ अमजद खान को जब अपार लोकप्रियता मिली, तो उन्होंने चोर पुलिस फिल्म बनाकर हाथ साफ किया. इसमें विनोद को उन्होंने मौका दिया मगर वह कोई काम नहीं आ सका.


अपने कैरियर के यादगार फिल्म और किरदार की बात करे तो 'अनुराग' (1972), 'नागिन' (1976), 'अनुरोध' (1977), 'साजन बिना सुहागन' (1978), 'जानी दुश्मन' (1979), 'बिन फेरे हम तेरे' (1979), 'द बर्निंग ट्रेन' (1980), 'साजन की सहेली' (1981), 'बेमिसाल' (1982), हमेशा से सिने प्रेमियों को पसंद आती रही हैं.
auto-thumb.php.jpg

फिल्मों के साथ ही विनोद मेहरा अपने अफेयर के लिए भी हमेशा खबरों में बने रहे. अरेंज मैरेज के दौर पर मीना ब्रोका उनकी पहली पत्नी थी. शादी- शुदा विनोद का दिल बिंदिया गोस्वामी पर आ गया जिनके साथ विनोद उन दिनों कई फिल्मों में काम कर रहे थे. विनोद और बिंदिया की शादी लंबे समय तक टिक नहीं पाई और बिंदिया से वे अलग हो गए. विनोद मेहरा और रेखा की नजदीकियों और रोमांस की चर्चाएँ बॉलीवुड में कई दिनों तक सुर्ख़ियों में रही. कहा जाता हैं कि दोनों ने शादी भी की थी. वैसे विनोद मेहरा ने तीन शादियाँ की. इसके बाद किरण से उन्होंने विवाह रचाया. किरण और विनोद की एक बेटी सोनिया और एक बेटा रोहन हैं. सोनिया मेहरा पिछले दिनों कुछ फिल्मों में भी नजर आई. जिनमें 'विक्टोरिया नं. 303' और 'एक मई और एक तू' शामिल हैं.


जब अभिनेता के रूप में उनके पास ज्यादा कुछ करने को नहीं रहा तो वो निर्देशन के मैदान में उतरे. उन्होंने ऋषि कपूर, अनिल कपूर और श्रीदेवी को लेकर फिल्म 'गुरुदेव' शुरू की जो उस वक्त के कामयाब सितारे थे, लेकिन गुरुदेव को बनने में लंबा वक्त लगा और फिल्म पूरी भी न हो पाई थी की फिल्म के रिलीज होने के पूर्व ही वे चल बसे. 30 ऑक्टोबर 1990 को तमाम बातों पर विनोद की मौत ने फुलस्टॉप लगा दिया. अचानक दिल का दौरा आ जाने से वे असमय मात्र 45 वर्ष की उम्र में ही विदा हो गए.


भले ही आज वो हमारे बीच नहीं रहे पर उनकी अदाकारी आज भी हमें उनकी याद दिलाती हैं.