Life and Journey of Superstar

सिनेमा का सबसे बड़ा खलनायक 'प्राण'
 Pran _1_ - Copy.JPG                              पिछले दिनों फ़िल्मी गलियारों और देश में सबसे बड़ी खबर आयी की अभिनेता प्राण को दादा साहब फाल्के २०१३ के पुरस्कार दिया जाएगा तो हमने एक बार फिर अभिनेता प्राण के कैरियर के सफ़र को अपने पाठको के सामने प्रस्तुत करने की इच्छा हुई. कुछ सितारों के सफ़र ऐसे होते है मानो उस पर सुनहरे पंख लगे हो. अभिनेता प्राण का फिल्मी कैरियर भी किसी सुनहरे सफ़र से कम नही है. 12 फरवरी 1920 को दिल्ली में पैदा हुए प्राण ने सैकड़ों फिल्मों में यादगार भूमिकाएं निभाई हैं. प्राण के पिता लाला केवल कृष्ण सिकंद एक सरकारी ठेकेदार थे, जो आम तौर पर सड़क और पुल का निर्माण करते थे. अपने काम के सिलसिले में इधर- उधर रहने वाले लाला केवल कृष्ण सिकंद के बेटे प्राण की शिक्षा कपूरथला, उन्नाव, मेरठ, देहरादून और रामपुर में हुई. प्राण का पढ़ाई में मन ज्यादा नहीं लगता था. जीवन में कुछ कर गुजरने की तमन्ना उनके मन में अवश्य रही. उनको शायद स्वयं भी अंदाजा था ‍कि अपनी जिंदगी में कैरियर के लिए फिल्म लाइन बेहतर अवसरों के साथ उनका इंतजार कर रही होगी.



प्राण ने मैट्रिक तक की शिक्षा ली. उसके बाद वे पढ़े नहीं. युवावस्था में वे कुछ खास करना चाह रहे थे मगर क्या करेंगे यह तय नहीं था. युवावस्था में प्राण साहब का फोटोग्राफी के प्रति बड़ा लगाव था. इसी वजह से वे दिल्ली चले गए और एक स्टूडियो में नौकरी कर ली. बाद में स्टूडियो मालिक ने शिमला में अपना एक और शॉप खोला जहां प्राण साहब को उस शॉप की जिम्मेदारी सौंपकर भेज दिया गया. प्राण शिमला में काम करने लगे. एक साल वहां रहने बाद में फिर इसी काम के सिलसिले में वे लाहौर चले गए.



बतौर फोटोग्राफर लाहौर में अपना कैरीयर शुरु करने वाले प्राण को 1940 में ‘यमला जाट’ नामक फिल्म में पहली बार काम करने का अवसर मिला. उसके बाद तो प्राण ने फिर पलट कर नहीं देखा. उन्होंने लगभग 400 फिल्मों में काम किया. एक तरफ उनके नाम ‘राम और श्याम’ के खलनायक की ऐसी तस्वीर रही है, जिससे लोगों ने पर्दे के बाहर भी घृणा शुरु कर दी थी, वहीं उनके नाम ‘उपकार’ के मंगल चाचा की भूमिका भी है.



1940 मे पंजाबी फिल्म 'यमला जाट' से उन्होने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुवात की जिसके लिए उन्हे 50 रुपये प्रति माह शूटिंग के दौरान पारिश्रमिक मिलता था. इस फिल्म मे प्राण साहब का एक बेहद ही  छोटा सा रोल था पर इसी फिल्म के निर्माता ने 1942 मे आई फिल्म 'खानदान' मे उन्होने एक रोमॅंटिक हीरो की भूमिका निभाई. दिलचप्स बात ये है उस जमाने मे हिरोइन मिलना मुश्किल था सो फिल्म 'यमला जाट' मे चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप मे काम कर चुकी नूरजहाँ को अभिनेत्री के रूप मे चुना गया. जो प्राण साहब से 15 साल छोटी थी और कद भी कम थी. प्राण साहब के बराबर लाने के लिए ईंटे रखी जाती थी. 'खानदान' के सुपरहिट होने बाद भी उन्होने आगे रोमॅंटिक हीरो बनने से मना कर दिया. उनके अनुसार बारिश मे हिरोइन के साथ भीगते हुए डॅन्स करना उन्हे शोभा नही देता था.



इस फिल्म के बाद प्राण साहब ने देश की आजादी से पहले 22 से ज्यादा फ़िल्मे की और देश आज़ाद होने के बाद लाहोर से मुंबई आ गये और मुंबई आ कर उन्होने शुरुआत और भी धमाकेदार तरीके से की. 1948 मे उनकी दो फ़िल्मे प्रदर्शित हुई जिसमे देव साहब और कामनी कौशल थी. ये फिल्म बेहद सफल रही है. 'ज़िद्दी' मे खलनायक की भूमिका ने उन्हे विशेष पहचान दी और उन्हे ऐसी ही भूमिका मिलने लगी. उन्होने उस दौर के सभी बड़े अभिनेता दिलीप कुमार, देव आनंद और राज कपूर की फ़िल्मो मे मुख्य खलनायक की भूमिका मे अपनी एक अलग छाप छोड़ी. प्राण साहब अभिनय के लिए आवाज़ के उतार चढाव को भी बेहद महवत्पूर्ण मानते थे और वे हमेशा इस पर मेहनत करते थे. उन्होने हमेशा समय के साथ चलना सीखा और नए युवा निर्देशको के साथ भी खूब काम किया.1970 के दशक आते आते उनका पारिश्रमिक  मुख्य अभिनेता से भी ज़्यादा होने लगा जबकि वी सहायक की ही भूमिका निभाते थे.

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प्राण साहब को हिंदी फिल्म का सबसे चर्चित खलनायक माना जाता है. 'हलाकू' (1956), 'देवदास' (1956), 'मधुमती' (1958), 'छलिया' (1960), 'जिस देश में गंगा बहती है' (1960), 'पत्थर के सनम' (1967), 'राम और श्याम (1967) जैसी चर्चित फ़िल्मो मे उन्होंने अपनी खलानयकी की ऐसी अमिट छाप छोड़ी की महिलाएं इन्हें देखकर दरवाजा बंद कर लेती थी और पर्दे पर आते ही गालिया देती थी. प्राण साहब इससे बेहद रोमांचित हो उठते थे. लेकिन असल ज़िंदगी में वे बेहद सीधे और मज़ाक पसंद इंसान थे. अपने सह कलाकारों और जरुरत मंद लोगो की हर मुश्किल मे उनके साथ होते थे. 'जंजीर' फिल्म के पहला शॉट देते ही उन्होने प्रकाश मेहरा साहब को कह दिया था जल्द ही बॉलीवुड को एक नया स्टार अमिताभ बच्चन के रूप मे मिलने वाला है.



जब वह खलनायक बनते हुए उब गये तो उन्होने अपनी खलनयिकी मे हास्य रंग भी डाला और कुछ चारित्रिक भूमिकाएं भी निभाई जिनमे 'शराबी' और 'सनम बेवफा' प्रमुख रूप से गिनी जाती है.



प्राण साहब ने कई अवॉर्ड भी जीते. 2001 मे पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. एक ख़ास बात है जो बहुत की कम लोगों को पता हैं की उन्हें खेलों के प्रति बहुत लगाव हैं. 50 के दशक में उनकी अपनी फुटबॉल टीम ‘डायनॉमोस फुटबॉल क्लब’ बहुत चर्चित रहा है. बढती उम्र और गिरते स्वास्थ के चलते वी आजकल फ़िल्मे नही करते लेकिन उनकी खलनायकी का जादू लोगो पर आज भी कायम है.